Tag Archives: manish varshney hindi poems

अनिश्चितता ही निश्चित है..

अनकहे से इसके शब्दों में,
अदृश्य छुपे से चित्रों में,
अविरत जीवन जल धारा की,
हर बूँद के सारे अंशों में,
बस एक सार ही चिह्नित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

समय सतत निरंतर एक प्रवाह,
अविराम चले ही जाता है,
हम सोचें कुछ हो जाये कुछ,
पटकथा नई लिख जाता है,
अचरजों भरी इस गंगा में,
बस विस्मय का जल ही संचित है |
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

जीवन पुस्तक के पृष्ठों में,
अनगिनत अनोखे खंड लिखे,
पर क्रूर काल न जाने कब,
अंतिम जीवन अध्याय लिखे,
सब कुछ अर्पण को विवश है वो,
जो काल कृपा से वंचित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

कामना के इस महासागर की,
गहराई का कोई अंत नहीं,
जितना उतरो उतना कम है,
तृष्णा का कोई अंत नहीं,
जीवन की अद्भुत माया से,
हर श्वांस यहाँ अचंभित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

मानव जीवन एक पत्ते सा,
पकना तय है, गिरना तय है,
साथी पत्तों संग एक बंधन,
जुड़ना तय है, छुटना तय है,
पकना – गिरना, जुड़ना – छुटना
आदि आरम्भ से निर्मित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

जो मिथ्या जीवन अभिमान करे,
वो परम सत्य ये भुलाता है,
कुछ भी न रहता दुनिया में,
सब चला यहाँ से जाता है,
कुछ भी न निश्चित इस जग में,
बस “परिवर्तन” ही निश्चित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

-ईशांश

अविरत- लगातार, कभी न रुकने वाला
विस्मय- आश्चर्य, अचरज
अचंभित- हैरान, आश्चर्य चकित

पूर्णिमा का चाँद

चांदनी से आज नहा के
श्रृंगार स्वर्ग से करा के,
अम्बर में फिर निकला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

स्वर्ग आलोक को तज कर
अब काम रति विचरे हैं,
कहें क्या आनंद मिला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

कभी सिंधु को चमकाता
श्वेत रंग धरा पे छिडकाता,
सबका मन ललचाता है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

क्या मधुर समय आया है
हर कोई हर्षाया है,
क्या समां और निखरा है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

कभी बदली से नज़र चुराता
कभी पीछे उसके पड़ जाता,
अठखेलियां करता है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

सब सितारे जलते बुझते
ये चांदनी हमें मिल जाती,
उससे हर कोई जलता है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

चित्तशांत सी कोई कोयल
उसे देख चहक जाती है,
स्वर गीत नया निकला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

सब सोये फूल जगे हैं
उमंगों में बिखरे है,
बग़िया का आँचल फैला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

हर पत्ता लहराता है
हर डाली लहराती है,
चहुँ ओर उन्माद भरा है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

चंदा का हाथ पकड़कर
ये रात्रि कैसे घूमे
आज प्रेम से प्रेम मिला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

श्वेत रात्रि आस लगाए
ओ चंदा तुम रुक जाना,
फिर मन मेरा मचला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

वो चंदा बोले सुनो निशि
प्रेम क्षण में न तुम शोक करो,
ये तो मिलन वेला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

मैं तो फिर से आऊंगा
फिर तुम से मिल जाऊंगा
थोड़ा विरहन अच्छा है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

मंजुसुत ईशांश

ज़माना तो फिर ज़माना है

ज़माना तो फिर ज़माना है
इसे बन के क्या दिखाना है..

ख़ाली बोतलों में ये जाम ढूंढे
भरे पैमानों को इसे छलकाना है..
ज़माना तो फिर ज़माना है
इसे बन के क्या दिखाना है..

वक़्त काटने को इसे बातें चाहिए
बातों को इसकी दिल से क्या लगाना है..
ज़माना तो फिर ज़माना है
इसे बन के क्या दिखाना है..

सब बेगाने ही इसने अपने माने
अपनों को इसने कहाँ अपना माना है..
ज़माना तो फिर ज़माना है
इसे बन के क्या दिखाना है..

अपना दर्द अपनी ख़ुशी बस यही सच्चे हैं..
औरों का ग़म उनकी हंसी तो सब बहाना है..
ज़माना तो फिर ज़माना है
इसे बन के क्या दिखाना है..

जिसे न देखा उसे खुदा माना
जिसे देखा उसे न पहचाना है..
ज़माना तो फिर ज़माना है
इसे बन के क्या दिखाना है..

-मंजुसुत ईशांश

कोई क्या जाने..कि क्या बीती..

कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

न दिल ये मेरा कुछ
कभी कह पाया
दिल की सब बातें
दिल में बीती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

वो दिल जो लगाते
तो सुन पाते
दिल की हर धड़कन
क्या क्या कहती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

इंतज़ार तो उनका
मैंने रोज़ किया
कभी आ जाती
कभी वो न आती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

मुस्कुरा के वो बस
आगे बढ़ जाते
मुझे छीन के मुझसे
वो ले जाती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

उस एक हंसी से
मैं जी जाता
उस एक हंसी पे
जान निकल जाती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

मेरा हर एक दिन
इंतज़ार में डूबा
और याद में उनकी
हर रैना बीती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

उन्हें पता न होगा
कोई कितना चाहे
उन्हें मांग मांग कर
हर दुआ बीती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

पर साथ ग़ैर के
वो चले गए
राह तकती मेरी
घड़ियाँ बीती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

ये इनाम इश्क़ का
महबूब न मिलता
इस ख़ज़ाने से बस
यादें मिलती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

इससे अच्छा तो
वो न मिलते
ये दर्द न होता
ये तड़प न मिलती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

उन आँखों को मैं
कैसे भूलूँ
जिन आँखों में सारी
दुनिया बसती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

अब याद मुझे जब
वो आ जाते हैं
आँखें पहले सी
गीली होती
कोई क्या जाने
कैसे बीती..
कोई क्या जाने
कि क्या बीती..

-मंजुसुत ईशांश

नैना ना मिले..

तोसे कभी भी कुछ
कहे नहीं हैं,
मेरे नैना तेरे नैनों से
कभी मिले नहीं हैं..

कितनी दफा ये नज़रें
तेरी नज़रों से मिलने गईं,
हर दफा बस तेरा
चेहरा ही छूकर आईं,
दिल की प्यास बढ़ाते हैं
कभी बुझाते नहीं हैं..
मेरे नैना तेरे नैनों से
कभी मिले नहीं हैं..

अजब ही इनकी हालत है,
तेरे चेहरे की
न जाने इनको क्या आदत है,
तू सामने हो न हो,
तेरा चेहरा एक पल कभी
भुलाते नहीं हैं..
मेरे नैना तेरे नैनों से
कभी मिले नहीं हैं..

तेरी कोई ख़ता नहीं
कि गुस्ताख़ तो यहीं है,
जब कभी तेरी नज़रें
मेरी तरफ बढ़ें,
ये फिर जाते हैं,
ये झुक जाते हैं,
खुद ही दिल की बात तुझे
कभी बताते नहीं हैं..
मेरे नैना तेरे नैनों से
कभी मिले नहीं हैं..

ये पागल कैसे डरते हैं,
कि आखों से आँखें
जो मिल गईं,
दिल की बात दिल तक
जो पहुँच गई,
खुदा जाने क्या होगा,
खुदा जाने क्या न होगा,
इस कश्मकश में
मेरे दिल की बात आगे
कभी बढ़ाते नहीं हैं..
मेरे नैना तेरे नैनों से
कभी मिले नहीं हैं..

तोसे कभी भी कुछ
कहे नहीं हैं,
मेरे नैना तेरे नैनों से
कभी मिले नहीं हैं..

-मंजुसुत इशांश

कहीं एक खाली सड़क है..

खुले आसमान के नीचे
एक सुनसान सूनी सहमी
कुछ कदमों की प्यासी सड़क है..
कहीं एक खाली सड़क है..

वो ना जाने
कहाँ से आती है,
वो ना जाने
कहाँ को जाती है,
ना नाम है कोई,
ना निशान है कोई,
बस अकेली गुमनाम सड़क है..
कहीं एक खाली सड़क है..

किनारे के पेड़ों के पत्ते
जो कभी सजाते थे उसे,
वो हरी भरी डालें
जो कभी संवारती थीं उसे,
वो पत्ते खो गए,
वो डालें टूट गईं,
सूखे पेड़ों के बीच
एक अकेली उदास सड़क है..
कहीं एक खाली सड़क है..

डालों पे कभी
कुछ पंछी आ जाते थे,
खेलते, लड़ते, उड़ते, उछलते
कुछ मीठे गीत सुना जाते थे,
अब एक पंछी न दिखे,
एक साया न मिले,
बीते वक़्त को याद करती
एक मुरझाई ख़ामोश सड़क है..
कहीं एक खाली सड़क है..

जो बरसात हो
तो आँखें भिगा लेती है,
जब सूरज जले तो
दिल अपना जला लेती है,
बिजली चमके अगर
तो डर जाती है,
चाँदनीं बरसे अगर तो
मुस्कुरा जाती है,
सब सहती, चुप रहती,
एक बेआवाज़ अनजान सड़क है..
कहीं एक खाली सड़क है..

जाने कब से पलकें खुली हैं,
थकी निगाहें जाने कब से बिछी हैं,
कि इक राही तो आ जाये,
कोई एक साथी तो आ जाये,
कभी न ख़त्म होते
इंतज़ार में डूबी सड़क है..
कहीं एक खाली सड़क है..

जाने किस मंज़िल से मिली है,
जाने किस साहिल से जुड़ी है,
कोई राही कभी चले,
तो सड़क से फिर राह बने,
यही तो मंज़िल, रस्ते
और सड़क में फरक है..
कहीं एक खाली सड़क है..
एक सुनसान सूनी सहमी
कुछ कदमों की प्यासी सड़क है..
कहीं एक खाली सड़क है..

शायद फिर मिले न मिले..

आ ज़िन्दगी से
थोड़ा वक़्त मांग ले..
शायद फिर रहे न रहे
शायद फिर मिले न मिले..

तू माने न माने
तेरा दिल मुझसे जुड़ा है,
तू माने न माने
मेरा रंग तुझपे चढ़ा है,
बस एक बार ही सही
कब से दबी,
वो हसरत मांग ले..
शायद फिर रहे न रहे
शायद फिर मिले न मिले..

वो वक़्त याद कर
जब मैं तेरे साथ था,
वो वक़्त याद कर
जब मैं तेरे पास था,
बस एक बार ही सही
सुनहरा मेरा संग,
तू फिर से मांग ले..
शायद फिर रहे न रहे
शायद फिर मिले न मिले..

इस ज़िन्दगी ने अपने
साथ के वो पल,
तुझे कम दिए
मुझे कम दिए,
बस एक बार ही सही
वो सारे खोये पल
तू फिर से मांग ले..
शायद फिर रहे न रहे
शायद फिर मिले न मिले..

तेरा दामन भी
खुशियों से खाली है,
यहाँ मेरे होंठ भी
एक हंसी को तरसते हैं,
बस एक बार ही सही
तेरी मेरी खुशियां
तू फिर से मांग ले..
शायद फिर रहे न रहे
शायद फिर मिले न मिले..

तेरे पास मैं नहीं
तो तेरे पास क्या है?
मेरे पास तू नहीं
तो मेरे पास क्या है?
बस एक बार ही सही
मैं तुझे मांग लूँ
तू फिर मुझे मांग ले..
शायद फिर रहे न रहे
शायद फिर मिले न मिले..

ये दुनिया तुझे कभी
मेरा साथ न देगी,
ये दुनिया तुझे कभी
मेरा एहसास न देगी,
बस एक बार ही सही
पर मुझे मांग कर
तू अपनी दुनिया मांग ले..
शायद फिर रहे न रहे
शायद फिर मिले न मिले..

जहाँ मैं नहीं हूँ
वो धड़कनें अधूरी है,
जहाँ तू नहीं है,
वो साँसें अधूरी हैं,
बस एक बार ही सही
इस ज़िन्दगी से अपनी
ज़िन्दगी मांग ले..
शायद फिर रहे न रहे
शायद फिर मिले न मिले..

-मंजुसुत इशांश

मैं तेरी राह तकता हूँ

तुझे याद करता हूँ
तेरी राह तकता हूँ,
तू पास नहीं है जो
तेरे पास होने की
फरियाद करता हूँ |
तुझसे अलग होकर
दिल टूटता सा है,
दिल के उन टुकड़ों को
मैं जोड़ जोड़ कर,
तुझे दिल में रख लेता हूँ|
फिर तुझे याद करता हूँ,
फिर तेरी राह तकता हूँ ||

तुझसे अलग होकर
मेरे इस सीने में,
एक दर्द सा उठता है
वो दर्द निकलता है,
एक आह सी भरता है
फिर मैं तड़पता हूँ,
तू पास नहीं है जो
तेरे पास होने की
फरियाद करता हूँ |
फिर तुझे याद करता हूँ,
फिर तेरी राह तकता हूँ ||

तू मेरे लिए क्या है
मैं बता नहीं सकता,
तेरे साथ की कीमत
कभी जता नहीं सकता,
जानता हूँ बस इतना,
तू प्रार्थना के जैसी है,
एक दुआ के जैसी है,
फिर दुआ मैं करता हूँ,
तू पास नहीं है जो
तेरे पास होने की
फरियाद करता हूँ |
फिर तुझे याद करता हूँ,
फिर तेरी राह तकता हूँ ||

मैं तुझसे कहता हूँ
कुछ बातें करनी हैं,
में तुझसे कहता हूँ
कभी एक रात जगनी है,
पर तेरे साथ में होकर
मदहोश मैं जीता हूँ,
तू पास नहीं है जो
तेरे पास होने की
फरियाद करता हूँ |
फिर तुझे याद करता हूँ,
फिर तेरी राह तकता हूँ ||

मुझे कभी समझ न आया
क्यों उसने मुझे बनाया?
पर जब से तू मुझे मिली है
जीने की राह मिली है,
भूले से इन सांसों का
अफ़सोस नहीं करता हूँ,
तू पास नहीं है जो
तेरे पास होने की
फरियाद करता हूँ |
फिर तुझे याद करता हूँ,
फिर तेरी राह तकता हूँ ||
मैं तेरी राह तकता हूँ ||

ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है?

कभी हवा सी बह रही है,
कभी मूरत सी उदास बैठी है,
बेबस वो कभी हंसती है,
बेबस वो कभी रोती है,
आंधी से मजबूर किसी बादल सी
कभी ठहरी तो कभी उड़ रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

खुद की परवाह किये बिना,
बेपरवाह सी चल रही है,
मेरा तो अब कोई बस नहीं,
तो बेबस ही चल रही है,
कोई आड़ मिले तो छुप जाये,
सब की आँखों से बच जाये,
बस यही इंतज़ार कर रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

एक हाथ में एक सपना लिए,
एक हाथ में एक उम्मीद लिए,
सर पे आशाओं का घड़ा रखे,
बेबस किसी खिलाडी सी,
मन में गिरने का डर लिए,
पतले धागे पे चल रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

धड़कन की एक आवाज़ पर
जो भागी भागी आती थी
मासूम से मेरे गालों पर
प्यार से अपना हाथ फेर जाती थी,
अब चीखूँ भी तो सुने नहीं
वो बेबस किसी पागल सी
जाने किस डगर खो रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

मुझे याद आता है वो गर्मी में,
मेरा पसीना पोंछ जाती थी,
जाड़े की कड़कड़ ठंडी में
मेरे पास अलाव जला जाती थी
आँखों में कभी जो आंसूं हों
मेरा हाथ पकड़ लेती थी,
बेबात कभी में हँसता था,
मेरे संग हंसी पकड़ लेती थी,
मुझे छोड़ मेरा साथ छोड़,
अभी वो जाने कहाँ फिर रही है
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है|

मुझे याद आता है,
वो कभी मेरे पीछे भागती थी,
उसकी पायल की आवाज़ें सुनकर,
कभी मैं उसके पीछे भागता था|
मेरी ज़िन्दगी मेरे साथ
और मैं अपनी ज़िन्दगी के साथ चलता था|
अब मैं किसी और रस्ते,
ज़िन्दगी किसी और राह चल रही है|
जाने ये ज़िन्दगी कैसे जी रही है||

आज कई दिनों बाद,
फिर मुझे उसका ख्याल आया है,
उसके पास मेरे लिए वक़्त न सही,
फिर भी मैंने उसे पास बुलाया है,
आएगी तो कहूंगा मुझे भूले नहीं,
और पूछूंगा कि मेरे बिना
वो कहाँ और कैसे जी रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है,
मेरी ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

ख़ुशी के फूल

ख़ुशी के फूल,
मैंने चुने तेरे लिए,
दर्द के कांटे सभी,
अपने पास रख लिए|
मुस्कुराहटों की मिठास,
बचाई तेरे लिए,
और कड़वाहटों के समंदर,
मैंने खुद ही पी लिए ||

बेबसी में,
खामोशियों की चीखें सुनी,
घुटन के धुंए में,
सांसें मिलीं|
पर सुकून के रास्ते,
मैंने बनाये तेरे लिए,
और बेचैनियों की सड़कों पर,
कदम अपने रख दिए ||

रौशनी जो धोखा है,
तो अँधेरे में सच्चाई है,
अगर दिन काम का न रहा,
तो फिर रात मेरे काम आई है|
पर सुबहों की हर ताज़गी,
मैंने छुपाई तेरे लिए,
और शामों की थकावटों के,
सब पल अकेले जी लिए ||

इस ज़िन्दगी में,
लाखों ही शब्द मैंने पढ़े हैं,
इस ज़िन्दगी में,
लाखों ही शब्द मैंने सुने हैं|
कुछ ही अनमोल शब्द ढूंढ पाया,
जो मैंने कहे तेरे लिए,
और जो न कह सका,
वो एहसास मैंने कागज़ पे लिख दिए ||

मेरे ग़म को कभी नज़र लगे,
तो होठों पे एक हंसी आती है,
मेरे डर को थोड़ा डर लगे,
तो सुकून की कोई लहर आती है|
तेरे होठों पे मासूम हंसी रहे,
ऐसे जतन मैंने हज़ार किये,
और अपने डर, अपने ग़म,
मैंने झूठी हंसी से दबा दिए ||

जो तू न हो, तो
ये जहाँ रहने के काबिल नहीं,
जो तू न हो, तो
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी जैसी कोई बात नहीं|
तू रहे साथ हमेशा,
तू रहे पास हमेशा,
रब को सज़दे मैंने हर बार किये|
मेरे दामन में हंसी की कोई एक कली,
चाहे रहे न रहे,
पर ख़ुशी के फूल सभी,
बस तेरे लिए मांग लिए ||

“माँ”, आज फिर तू याद आई है (Written by my soulmate, my wife – Isha)

एक प्यारी सी मुस्कान होठों पे आई है,
आज फिर तू याद आई है|
ये ठंडी हवा, संग प्यार तेरा लाई है,
आज फिर तू याद आई है||

तेरे आँचल तले बिताया,
वो वक़्त कितना प्यारा था|
भोले से बचपन को बस,
तेरी ममता का सहारा था|
इस झूठी दुनिया में,
बस तुझमें ही सच्चाई है|
आज फिर तू याद आई है||

मुझे यूँ गले से लगा लेती थी,
जैसे मेरे सारे दुःख,
खुद में समा लेती थी|
तेरे डांटने में भी प्यार छिपा था,
ये बात आज समझ आई है|
आज फिर तू याद आई है||

मेरे रूठ जाने पर,
तेरा मुझे मनाना,
मेरी पसंद का खाना बनाकर मुझे खिलाना,
तेरे हाथों से बने खाने का स्वाद,
न अब तक ये ज़ुबाँ भूल पाई है|
आज फिर तू याद आई है||

बीमार मेरे पड़ने पर,
तेरा खुद को भूल जाना|
सारे काम छोड़,
बस मेरा दिल बहलाना|
मेरी चिंता में न जाने,
कितनी रातें तू न सो पाई है|
आज फिर तू याद आई है||

उन सर्द रातों में,
तेरा बार बार जगना,
नंगे ही पैर,
मेरे कमरे की तरफ भागना,
ये सोच के, कि रज़ाई,
मैंने फिर फर्श पे गिराई है|
आज फिर तू याद आई है||

मेरी छोटी सी कामयाबी में,
खुश हो जाती थी|
मेरी बनाई साधारण सी,
तस्वीरें भी तुझे कितना भाती थीं|
मेरे लिए दुनिया सी लड़ने वाली,
मौत से न लड़ पाई है|
आज फिर तू याद आई है||
“माँ”, आज फिर तू याद आई है||

“ये दूरी एक तपस्या है”

ये विरह बड़ी समस्या है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

जो किया क्या वो सही किया?
जो जिया क्या वो सही जिया?
तू प्रश्न हमेशा करती है,
मैं उत्तर न दे पाता हूँ,
कि होनी एक अटल अवस्था है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

मैं कटे फूल सा मुरझाया,
तू बिन बारिश धरती सी है|
मैं सांसों का एक चलता साया,
तू रुकी हुई नदिया सी है|
अनसुलझी सी एक व्यथा है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

दो जिस्म भले हम दिखते हों,
आत्मा तो अपनी एक है|
दिल दो भले धड़कते हों,
धड़कन तो उनकी एक है|
फिर एक जैसी ही तो तमन्ना है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

तुझ संग मैं बाग़ सा खिलता हूँ,
और तू कली सी महकती है|
मैं प्रेम गगन में उड़ता हूँ,
जहाँ तू चिड़िया सी चहकती है|
बेसब्र मिलन की इच्छा है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

पर तुझको याद दिला दूँ मैं,
सब दिन एक जैसे न होंगे|
तुझको ये बात बता दूँ मैं,
हम दूर हमेशा न होंगे|
कि हर पल में यही दुआ है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

मैं ऐसे तो न जलता

मेरी तन्हाई की उमस को,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|
मेरे सूने दिल को,
तेरी धड़कनों की आवाज़ मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता||

तेज़ धूप में सूखा पत्ता जल जाता है,
शमां की गर्मी से मोम पिघल जाता है,
जो तू पास होती..
मैं वो पत्ता, वो मोम तो न बनता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

जहाँ लाल दिखे सिर्फ वहीँ तो आग नहीं होती,
मेरी ख़ामोशी तो बिन रंग जला करती है,
जो तू पास होती..
मैं इस तरह से खामोश तो न रहता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

ये जीवन ऐसी माचिस की डिबिया है,
ये दिन रात उस डिबिया की तीलियाँ हैं,
नित जलती तो हैं पर बुझती नहीं,
जो तू पास होती..
मेरा कोई पल ऐसी तीली न बनता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

जब बादलों से छन के धूप निकलती है,
साये से ढंकी ये धरती फिर चमकती है,
जो तू पास होती..
मैं इस तड़प के साये में तो न बसता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

बिन बरसात मैंने इस धरती को जलते देखा है,
बिन आंसुओं के उसे रोते देखा है,
जो तू पास होती..
मैं बारिश की वैसी आस तो न बनता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

किसी बात में ये दिल नहीं लगता,
तुझसे लगा है बस तुझे चाहता है,
जो तू पास होती..
मैं अपने दिल के आगे यूँ बेबस तो न रहता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

बरसों से इन सांसो में एक तेज़ गति है,
जाने कब से एक हलचल सी मन में बसी है,
जो तू पास होती..
मैं हमेशा ऐसे बैचेन तो न रहता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

जब भी तेरी याद आ जाती है,
सिर्फ दिल नहीं, रूह नहीं,
जिस्म के हर रेशे से टकराती है,
जो तू पास होती..
मैं हर घडी ये चोटें तो न सहता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

लगता नहीं कि ज़िन्दगी अब ऐसे चल पायेगी,
या मैं जी पाउँगा या बस जलन रह जाएगी,
कि जो तू पास होती..
मैं ऐसे जल जल के तो न जीता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|
मेरे सूने दिल को,
तेरी धड़कनों की आवाज़ मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता||

मेरी तमन्नाएँ

मेरी तमन्नाएँ,
ये मुझसे कुछ कहती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

कभी तेज़ किसी तूफान सी,
मेरे मन में उठती जाती हैं|
इस जग माया के जंगल में,
कभी कई दिनों खो जाती हैं|
कभी दर्द दे जाती हैं,
कभी मरहम बन जाती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

मैं कुछ भी न कह पाऊं,
कभी चुप सा कर देती हैं|
मैं उन्हें ही जपता जाऊं,
कभी चुप ही नहीं होती हैं|
कभी खिलखिला देती हैं
कभी मायूस हो जाती हैं,
कभी पास नज़र आती हैं,
कभी दूर चली जाती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

तुम सबके मन की करते हो,
न अपने दिल की सुनते हो|
सब ही तुमको क्यूँ प्यारे हैं,
एक हम ही क्यूँ पराये हैं?
एक ताना दे जाती हैं,
एक कटाक्ष कर जाती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

और मैं ये समझाता हूँ,
अभी समय नहीं आया है|
मैं इनको बतलाता हूँ,
संदेहों का साया है|
इतना आसान ही होता,
जो चाहते वो कर जाते|
इतना आसान ही होता,
जो चाहते वो पा जाते|
मेरी आखें नम  जाती हैं,
फिर पलकें झुक जाती हैं|
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

मेरी तमन्नाएँ,
ये मुझसे कुछ कहती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

तेरी राह पे मैं चल दूँ

पलकों को बंद करके
तेरी तस्वीरों को याद करके,
बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

इन आखों से जो दिखती है
एक बेरंग सी दुनिया है,
“कागज़ों” के पीछे चलती
बड़ी बेढंग सी दुनिया है,
तेरी आँखों को याद करके
रौशनी से मैं मिल लूँ
बस बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

यहाँ हवा ठहरी सी है
दीवारों में जकड़ी सी है,
छाँव तो मुझे कहीं दिखी नहीं
बस धूप ही बिखरी सी है,
तेरी ज़ुल्फ़ों को याद करके
ठंडी छाँव से मन भर लूँ
बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

तेरे महके से आँगन में
पतझर में भी फूल खिलते हैं,
किरने भी और दमकती हैं
बादल भी खूब बरसते हैं,
तेरे आँचल को याद करके
उसे छूने को फिर तरसूं
बस बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

कभी एक शोर सा सुनता हूँ
कभी ख़ामोशी में बहता हूँ,
पागल एक परिंदे सा
बस उड़ता न ठहरता हूँ,
तेरी आवाज़ याद करके
एक राहत सी मैं सुन लूँ
बस बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

कितनी ही राहें जाती हैं
कुछ सीधी कुछ मुड़ जाती हैं,
कब से मैं ढूंढू राह तेरी
जो बस तुझ तक लेके जाती है,
खुली पलकों से जो दिखी नहीं
बंद नज़रों से दिख जाती है
वो अकेली राह ही मैं चुन लूँ
बस बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

कुछ इस तरह तुझसे इश्क़ हुआ था मुझे

कुछ इस तरह तुझसे इश्क़ हुआ था मुझे
तेरी नज़रों में फिरदौस दिखा था मुझे

आफ़ताब को जब भी एकटक देखता था
बस तेरा ही ख्याल आता था मुझे

इस जहाँ में मेरे लिए कुछ भी नया न था
तुझे मिलकर एक नया जहाँ मिल गया था मुझे

हूरों की वैसे तो यहाँ कोई कमी नहीं
पर तेरे हुस्न ने ही ज़िंदा किया था मुझे

इबादत से जैसे रूह महक उठती है
तेरी खुशबू ने वैसे महकाया था मुझे

तेरी सादगी का इस जहाँ में तो कोई जवाब नहीं
कि रूह तलक जिसने छू दिया था मुझे

तुझे सोचते, वक़्त, न जाने कब कट जाता था
हर लम्बा सफर भी छोटा लगता था मुझे

मेरे दोस्तों ने कई महफिलें सजाई थीं
तेरे बिना हर समां अधूरा लगा था मुझे

चाहे ख्वाब चाहे हक़ीक़त से चला आता हो
पर हर लम्हा तेरी ही याद दिलाता था मुझे

कभी मस्ती कभी उदासी में डूबा देता था
तेरी याद का हर लम्हा कभी हंसाता कभी रुला देता था मुझे

वैसे तो ये दुनिया बहुत बड़ी है
तेरे इश्क़ का हर एहसास बस तुझमें ही समेट देता था मुझे

अपने काम में मशगूल होने में मेरा कोई नाम न था
तेरी याद में मशगूल होने ने कुछ तो बदनाम किया था मुझे

तुझे मिल के में सारी नफरतों को भुला था
कुछ अपनों ने तेरे इश्क़ से जल के नफरत से देखा था मुझे

जाने कितने सवाल मेरे जेहन में उलझे से थे
तुझे देख के खुद के होने का जवाब मिल गया था मुझे

आवारगी में कभी ये अरमान कभी वो अरमान जगाता था
तुझे मिल के एक बस तेरा अरमान हुआ था मुझे

कोई मंदिर में आरती सुने कोई मस्जिद में सुने अज़ान
तेरे इश्क़ में खोके वही सुकून मिलता था मुझे

तेरी खुशबू से सारा शहर ही महकता था
हर गली हर चौराहे ने न जाने कितना दौड़ाया था मुझे

ताउम्र कोई चीज़ काम की न लगी मुझको
तुझसे इश्क़ करना पहला काम का काम मिला था मुझे

सुनसान सड़क सी मैंने ये ज़िन्दगी गुज़ारी थी
तुझे मिल के कई महफिलों का मज़ा मिला था मुझे

चाँद छूने को न जाने कितने ही बेक़रार होते होंगे
तुझे पाने की बेक़रारी में ही क़रार मिलता था मुझे

मेरे पास कुछ न था जिसकी मैं कोई बात करूँ
तुझे इश्क़ करके पहली बार गुमान हुआ था मुझे

वैसे चाहत की बारिशें हर किसी को नहीं भिगातीं
मेरा नसीब था तेरे इश्क़ ने भिगोया था मुझे

इस जहाँ में कोई शराब ऐसी नशीली नहीं
तेरे इश्क़ में जैसा नशा हुआ था मुझे

सांस एक बार आती है एक बार जाती है
तेरे इश्क़ में तो हर दम ही आराम मिला था मुझे

दुनिया में कोई डर ऐसा नहीं जो मुझे हरा सके
पर तेरे बिछड़ने के डर ने कई बार हराया था मुझे

बिन सोचे समझे बोलने की यूँ तो मेरी आदत नहीं
न जाने क्यों बिन बात मेरे होठों ने पुकारा था तुझे

दुआएं कैसे करते है मुझे मालुम न था
आसमान को देख हर रोज़ मैंने माँगा था तुझे

जाने कैसे तू मुझसे मिलने को राज़ी हुई
शायद मेरी दुआओं के असर ने बुलाया था तुझे

खुदा की नेमतों पे वैसे हर किसी का हक़ है
तुझे इश्क़ करने का हक़ बस मिला था मुझे

खुद के लिए तो मैंने कोई सिफारिश न की थी
जाने कैसे तेरे इश्क़ से रब ने नवाज़ा था मुझे

पहली मुलाक़ात का जब तोहफा तू ले आई थी
मदहोशी के आलम ने घेरा था मुझे

तुझे कहने को जो बातें सोची थीं, मैं कह न सका
पर आँखों ही आँखों में तूने समझा था मुझे

तुझे इश्क़ करना ही एक काम मेरे पास था
दूसरे हर काम से मेरे दिल ने दूर भगाया था मुझे

तू हर वक़्त पास रहे दिल यही दुहाई देता था
मेरे दिल ने इस क़दर कम्बख्त बनाया था मुझे

दिन को तेरी राह तकना रात में घड़ियाँ गिनना
तेरे इश्क़ ने कुछ ऐसा पागल बनाया था मुझे

तुझे मिलना तुझे सोचना बस यही ज़िन्दगी थी मेरी
तेरे इश्क़ ने आशिकी में ऐसा सरताज बनाया था मुझे

अपने इश्क़ का वो दौर कुछ ऐसा चला था
जैसे इश्क़ करने को रब ने सिर्फ तुझे और सिर्फ बनाया था मुझे

तेरे छूने का एहसास अब तक मेरी रूह में ज़िंदा है
वो एक छुअन से तूने अपनाया था मुझे

दिवाली ईद तो लोग एक बार मानते है
तेरे इश्क़ ने जश्न मनाने को हर रोज़ बुलाया था मुझे

तू जब भी मिलने आती थी हज़ार खुशियाँ साथ ले आती थी
और हर बार तेरे जाने ने कितना तड़पाया था मुझे

तेरी बातें मुझे कितना बैचैन करती थीं
और बस तेरी आवाज़ से ही चैन आता था मुझे

तेरे इश्क़ में सब से पराया हो चला था
और तेरे इश्क़ में सबने ही ठुकराया था मुझे

तेरे सिवा मैंने कभी न कोई परवाह की
तेरे सिवा कभी न कुछ और याद आया था मुझे

मेरे तेरे इश्क़ के खुमार में झूमता ही रहा
जाने कब इस ज़माने की नज़र लग गई मुझे

तुझे मिलने आना था और तू मिलने न आई
अब कभी न मिलने आएगी ये न कहलाया था मुझे

तेरे इंतज़ार में कितने ही ही दिन में वहीँ खड़ा रहा
कितने ही दिन तू आएगी ये कहकर दिल ने बहलाया था मुझे

दिल रोज़ तसल्ली देता था
तू छोड़ मुझे न पायेगी ये दिल ने समझाया था मुझे

पैग़ाम मिला तू चली गई
कैसे मैं रहूँगा न एक बार मेरा ख्याल आया था तुझे

तेरे पास होने पे सब अच्छा लगता था
तेरे दूर जाने पे वक़्त ने भी क्या खूब रुलाया था मुझे

जिन भी जगहों पे तू मिली थी
तेरे जाने के बाद कितनी दफा सबने बुलाया था मुझे

तेरे साथ जीना चाहता था मैं तेरे साथ रहना चाहता था
जाने क्या खता हुई जो रब ने छीना था तुझे

तेरे बिन जीना मुश्किल था
तो मेरे दिल ने फिर न जीने दिया मुझे

तुझे इश्क़ करने से पहले मैं ज़िन्दगी में आज़ाद था
तुझे इश्क़ करके ज़िन्दगी ने आज़ाद किया था मुझे

आज जाने कैसे तू फिर यहाँ चली आई है
जहाँ पहली दफा रब ने तुझसे मिलवाया था मुझे

मैं कल यहीं था मैं अब भी यहीं हूँ
जहाँ मेरा नसीब फिर से ले आया है तुझे

काश तुझे रब ये बता दे कि मैं अब न रहा
पर तुझे इश्क़ न करूँ ये अब भी गंवारा नहीं मुझे
तुझे मैं इश्क़ न करूँ ये कभी भी गंवारा नहीं मुझे..

ईशांश

वो मेरे ख्याल बांध नहीं सकते

वो शब्दों को बांध सकते हैं
मेरे ख्याल बांध नहीं सकते
वो कदम तो रोक सकते हैं
मेरे मन को बांध नहीं सकते |

बादल को किसने रोका है
बरसात को किसने रोका है
रौशनी को आना होता है
इस सुबह को किसने रोका है
वो दरवाज़े तो बंद कर सकते हैं
दिन और रात बांध नहीं सकते
वो शब्दों को बांध सकते हैं
मेरे ख्याल बांध नहीं सकते |

ये सूरज, चंदा, तारे सब
ये थे, ये हैं, ये सब होंगे,
ये कभी न मिटने पाएंगे
हम न होंगे पर ये होंगे
वो घडी को तोड़ सकते हैं
समय चक्र को बांध नहीं सकते|
वो शब्दों को बांध सकते हैं
मेरे ख्याल बांध नहीं सकते |

जैसे नदिया चंचल बहती है
जैसे कोयल बेसुध गाती है
जैसे बच्चे हँसते रोते हैं
बेफिकर से होके सोते हैं
वो नींदों को छीन सकते हैं
पर ख़्वाब बांध नहीं सकते
वो शब्दों को बांध सकते हैं
मेरे ख्याल बांध नहीं सकते |

आज़ादी सबको प्यारी है
फिर शब्दों को ही क्यों बांधें हम
मेरी कविता सबसे पूछे ये
पंछी के पंख क्यों काटें हम
वो कुछ देर सांसें रोक सकते हैं
पर धड़कनों को बांध नहीं सकते
वो शब्दों को बांध सकते हैं
मेरे ख्याल बांध नहीं सकते|
वो कदम तो रोक सकते हैं
मेरे मन को बांध नहीं सकते |

सपनों की पतंगें

ख्वाहिशों की डोर से
सपनों की पतंगें उड़ा लेता हूँ,
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

मेरे पास सपनों की
कई रंग बिरंगी पतंगें हैं
कुछ सस्ती कुछ महँगी
कुछ छोटी कुछ बड़ी पतंगें हैं
इस जहाँ में उनकी कोई दुकान नहीं
तो अपने ही मन से उन्हें खरीद लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

एक सपने की पतंग
कभी सुबह उडाता हूँ,
तो दूसरे सपने की पतंग
शाम को लहराता हूँ
रात नींद की बाँहों में
ये सारी पतंगें सहेज लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

वक़्त की ये हवा
जब धीमी सी बहती है,
मेरी कोई एक पतंग
कभी उड़ती कभी गिरती है
उम्मीद की थपकी से
उसे थोड़ा-थोड़ा बढ़ा लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

आकांक्षाओं के आकाश में
अनगिनत ऐसी पतंगें उड़ती होंगी
कुछ साथ-साथ बढ़ती
तो कुछ साथ-साथ कटती होंगीं
मेरी भी पतंग कहीं कट के गिर न जाये
कभी दाएं कभी बाएं
एक तेज़ खेंच से उसे बचा लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

ख्वाहिशों की डोर से
सपनों की पतंगें उड़ा लेता हूँ,
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

“चल ख़्वाब में चाँद पे मिलते हैं”

चल ख़्वाब में चाँद पे मिलते हैं,
धरती पे कोई जगह नहीं,,
हमें देख यहाँ सब जलते हैं,
की हमने ऐसी खता नहीं ||

तू प्यार की चादर ले आना,
मैं दिल का बिछौना लाऊंगा,,
मुझे देख के तू शरमायेगी,
तुझे देख के मैं मुस्काउंगा,,
चल निंदिया की डोली में चलते हैं,
लगती उसमें कोई टिकट नहीं |
चल ख़्वाब में चाँद पे मिलते हैं,
धरती पे कोई जगह नहीं ||

फूलों की बगिया न मिले सही,
तारों का गुलदस्ता लाऊंगा,,
नदिया की धारा न बहे सही,
प्रेम रस से तुझे भिगाउंगा,,
चल मन के पंखों से उड़ते हैं,
हमें रोकेगी कोई डगर नहीं,,
चल ख़्वाब में चाँद पे मिलते हैं,
धरती पे कोई जगह नहीं ||

देखेगी न कोई और नज़र,
न होगी इस जग की कोई फ़िकर,,
बस हाथों में होगा हाथ तेरा,
और तेरी नज़र पे मेरी नज़र,,
संग कुछ पल सुकून से बैठेंगे,
वहां डरने की कोई वजह नहीं,,
चल ख़्वाब में चाँद पे मिलते हैं,
धरती पे कोई जगह नहीं ||

वहां तारों के मेले देखेंगे,
कुछ खेल बचपन के खेलेंगे,,
चखने को चाहे कुछ न हो,
पर प्यार से मन हम भर लेंगे,,
चल जल्दी हम तुम सो जाते हैं,
करते अब कुछ भी देर नहीं,
चल ख़्वाब में चाँद पे मिलते हैं,
धरती पे कोई जगह नहीं,,
हमें देख यहाँ सब जलते हैं,
की हमने ऐसी खता नहीं ||