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मेरी कलम बुलाती है..

स्याही के नीले रंग से
काग़ज़ को रंगने को,
शब्दों के मोती की माला
फिर एक बार पिरोने को,
आशा की नज़रों से
मुझे तकती जाती है,,
मेरी कलम बुलाती है|
आवाज़ लगाती है||

कल्पना के सिंधु से
कुछ मोती चुन लाना,
फिर मेरी स्याही के रंग से
कागज़ पे सजा जाना,
उन्हें लिखते सजते देखने की
आरज़ु सुनती है,,
मेरी कलम बुलाती है|
आवाज़ लगाती है||

मैं तो शब्दों की प्यासी
वो मेरे शहज़ादे हैं,
मैं सागर में सिमटी मदिरा
और वो मेरे प्याले हैं,
इस सागर से प्याले भरकर
कोई ग्रन्थ नया लिख दो,
लेखों की वह साम्राज्ञी
निवेदिता बन जाती है,,
मेरी कलम बुलाती है|
आवाज़ लगाती है||

शब्द चाँद सितारे बनकर
कागज़ पे चमक जायेंगे,
उन्हें अनंत समय पढ़ पढ़कर
दनुज देव भी खिल जायेंगे,
हर शब्द नया हो अर्थ नया
कोई छंद नया लिख दो,
कर कमलों में अक्षर पुष्प लिए
अर्पिता बन जाती है,,
मेरी कलम बुलाती है|
आवाज़ लगाती है||

जैसे ही हाथ में लूँ
वो आनंदित हो जाये,
चिंतन के होठों से छू लूँ
तो शरमा सी वो जाये,
जो काग़ज़ पे रख दूँ
कोयल सी चहकती है,
और जो पहला शब्द लिखूं
वो पगली मदमाती है,
शब्दों के आँचल में छुप के
रोती कभी हंसाती है,,
मेरी कलम बुलाती है|
आवाज़ लगाती है||

अब रुको नहीं बस चले चलो
विश्राम बिना तुम चले चलो,
अभिलाषाएं पागल मन की
बस गढ़े चलो, तुम लिखे चलो,,
है कसम तुम्हें रुक न जाना
मुझे तृप्त किये बिन न जाना,
उड़ेल दो मेरी स्याही सब
रुक न जाना, तुम न जाना,,
मेरे नीले रक्त का हर क़तरा
जब इस कागज़ पे रंग जाये,
तभी तुम्हें आराम मिले
तभी तुम्हें कुछ चैन आये,,
कुछ लिख जाने का ऐसा उन्माद
मुझमें वो जगाती है,,
मेरी कलम बुलाती है|
आवाज़ लगाती है||

आशा की नज़रों से
मुझे तकती जाती है,,
मेरी कलम बुलाती है|
आवाज़ लगाती है||

-ईशांश

अनिश्चितता ही निश्चित है..

अनकहे से इसके शब्दों में,
अदृश्य छुपे से चित्रों में,
अविरत जीवन जल धारा की,
हर बूँद के सारे अंशों में,
बस एक सार ही चिह्नित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

समय सतत निरंतर एक प्रवाह,
अविराम चले ही जाता है,
हम सोचें कुछ हो जाये कुछ,
पटकथा नई लिख जाता है,
अचरजों भरी इस गंगा में,
बस विस्मय का जल ही संचित है |
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

जीवन पुस्तक के पृष्ठों में,
अनगिनत अनोखे खंड लिखे,
पर क्रूर काल न जाने कब,
अंतिम जीवन अध्याय लिखे,
सब कुछ अर्पण को विवश है वो,
जो काल कृपा से वंचित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

कामना के इस महासागर की,
गहराई का कोई अंत नहीं,
जितना उतरो उतना कम है,
तृष्णा का कोई अंत नहीं,
जीवन की अद्भुत माया से,
हर श्वांस यहाँ अचंभित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

मानव जीवन एक पत्ते सा,
पकना तय है, गिरना तय है,
साथी पत्तों संग एक बंधन,
जुड़ना तय है, छुटना तय है,
पकना – गिरना, जुड़ना – छुटना
आदि आरम्भ से निर्मित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

जो मिथ्या जीवन अभिमान करे,
वो परम सत्य ये भुलाता है,
कुछ भी न रहता दुनिया में,
सब चला यहाँ से जाता है,
कुछ भी न निश्चित इस जग में,
बस “परिवर्तन” ही निश्चित है|
कि अनिश्चितता ही निश्चित है,
एक अनिश्चितता ही निश्चित है ||

-ईशांश

अविरत- लगातार, कभी न रुकने वाला
विस्मय- आश्चर्य, अचरज
अचंभित- हैरान, आश्चर्य चकित

पूर्णिमा का चाँद

चांदनी से आज नहा के
श्रृंगार स्वर्ग से करा के,
अम्बर में फिर निकला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

स्वर्ग आलोक को तज कर
अब काम रति विचरे हैं,
कहें क्या आनंद मिला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

कभी सिंधु को चमकाता
श्वेत रंग धरा पे छिडकाता,
सबका मन ललचाता है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

क्या मधुर समय आया है
हर कोई हर्षाया है,
क्या समां और निखरा है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

कभी बदली से नज़र चुराता
कभी पीछे उसके पड़ जाता,
अठखेलियां करता है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

सब सितारे जलते बुझते
ये चांदनी हमें मिल जाती,
उससे हर कोई जलता है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

चित्तशांत सी कोई कोयल
उसे देख चहक जाती है,
स्वर गीत नया निकला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

सब सोये फूल जगे हैं
उमंगों में बिखरे है,
बग़िया का आँचल फैला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

हर पत्ता लहराता है
हर डाली लहराती है,
चहुँ ओर उन्माद भरा है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

चंदा का हाथ पकड़कर
ये रात्रि कैसे घूमे
आज प्रेम से प्रेम मिला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

श्वेत रात्रि आस लगाए
ओ चंदा तुम रुक जाना,
फिर मन मेरा मचला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

वो चंदा बोले सुनो निशि
प्रेम क्षण में न तुम शोक करो,
ये तो मिलन वेला है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

मैं तो फिर से आऊंगा
फिर तुम से मिल जाऊंगा
थोड़ा विरहन अच्छा है
आज पूर्णिमा का चाँद खिला है..

मंजुसुत ईशांश

ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है?

कभी हवा सी बह रही है,
कभी मूरत सी उदास बैठी है,
बेबस वो कभी हंसती है,
बेबस वो कभी रोती है,
आंधी से मजबूर किसी बादल सी
कभी ठहरी तो कभी उड़ रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

खुद की परवाह किये बिना,
बेपरवाह सी चल रही है,
मेरा तो अब कोई बस नहीं,
तो बेबस ही चल रही है,
कोई आड़ मिले तो छुप जाये,
सब की आँखों से बच जाये,
बस यही इंतज़ार कर रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

एक हाथ में एक सपना लिए,
एक हाथ में एक उम्मीद लिए,
सर पे आशाओं का घड़ा रखे,
बेबस किसी खिलाडी सी,
मन में गिरने का डर लिए,
पतले धागे पे चल रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

धड़कन की एक आवाज़ पर
जो भागी भागी आती थी
मासूम से मेरे गालों पर
प्यार से अपना हाथ फेर जाती थी,
अब चीखूँ भी तो सुने नहीं
वो बेबस किसी पागल सी
जाने किस डगर खो रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

मुझे याद आता है वो गर्मी में,
मेरा पसीना पोंछ जाती थी,
जाड़े की कड़कड़ ठंडी में
मेरे पास अलाव जला जाती थी
आँखों में कभी जो आंसूं हों
मेरा हाथ पकड़ लेती थी,
बेबात कभी में हँसता था,
मेरे संग हंसी पकड़ लेती थी,
मुझे छोड़ मेरा साथ छोड़,
अभी वो जाने कहाँ फिर रही है
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है|

मुझे याद आता है,
वो कभी मेरे पीछे भागती थी,
उसकी पायल की आवाज़ें सुनकर,
कभी मैं उसके पीछे भागता था|
मेरी ज़िन्दगी मेरे साथ
और मैं अपनी ज़िन्दगी के साथ चलता था|
अब मैं किसी और रस्ते,
ज़िन्दगी किसी और राह चल रही है|
जाने ये ज़िन्दगी कैसे जी रही है||

आज कई दिनों बाद,
फिर मुझे उसका ख्याल आया है,
उसके पास मेरे लिए वक़्त न सही,
फिर भी मैंने उसे पास बुलाया है,
आएगी तो कहूंगा मुझे भूले नहीं,
और पूछूंगा कि मेरे बिना
वो कहाँ और कैसे जी रही है|
ये ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है,
मेरी ज़िन्दगी जाने कैसे जी रही है||

ख़ुशी के फूल

ख़ुशी के फूल,
मैंने चुने तेरे लिए,
दर्द के कांटे सभी,
अपने पास रख लिए|
मुस्कुराहटों की मिठास,
बचाई तेरे लिए,
और कड़वाहटों के समंदर,
मैंने खुद ही पी लिए ||

बेबसी में,
खामोशियों की चीखें सुनी,
घुटन के धुंए में,
सांसें मिलीं|
पर सुकून के रास्ते,
मैंने बनाये तेरे लिए,
और बेचैनियों की सड़कों पर,
कदम अपने रख दिए ||

रौशनी जो धोखा है,
तो अँधेरे में सच्चाई है,
अगर दिन काम का न रहा,
तो फिर रात मेरे काम आई है|
पर सुबहों की हर ताज़गी,
मैंने छुपाई तेरे लिए,
और शामों की थकावटों के,
सब पल अकेले जी लिए ||

इस ज़िन्दगी में,
लाखों ही शब्द मैंने पढ़े हैं,
इस ज़िन्दगी में,
लाखों ही शब्द मैंने सुने हैं|
कुछ ही अनमोल शब्द ढूंढ पाया,
जो मैंने कहे तेरे लिए,
और जो न कह सका,
वो एहसास मैंने कागज़ पे लिख दिए ||

मेरे ग़म को कभी नज़र लगे,
तो होठों पे एक हंसी आती है,
मेरे डर को थोड़ा डर लगे,
तो सुकून की कोई लहर आती है|
तेरे होठों पे मासूम हंसी रहे,
ऐसे जतन मैंने हज़ार किये,
और अपने डर, अपने ग़म,
मैंने झूठी हंसी से दबा दिए ||

जो तू न हो, तो
ये जहाँ रहने के काबिल नहीं,
जो तू न हो, तो
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी जैसी कोई बात नहीं|
तू रहे साथ हमेशा,
तू रहे पास हमेशा,
रब को सज़दे मैंने हर बार किये|
मेरे दामन में हंसी की कोई एक कली,
चाहे रहे न रहे,
पर ख़ुशी के फूल सभी,
बस तेरे लिए मांग लिए ||

“माँ”, आज फिर तू याद आई है (Written by my soulmate, my wife – Isha)

एक प्यारी सी मुस्कान होठों पे आई है,
आज फिर तू याद आई है|
ये ठंडी हवा, संग प्यार तेरा लाई है,
आज फिर तू याद आई है||

तेरे आँचल तले बिताया,
वो वक़्त कितना प्यारा था|
भोले से बचपन को बस,
तेरी ममता का सहारा था|
इस झूठी दुनिया में,
बस तुझमें ही सच्चाई है|
आज फिर तू याद आई है||

मुझे यूँ गले से लगा लेती थी,
जैसे मेरे सारे दुःख,
खुद में समा लेती थी|
तेरे डांटने में भी प्यार छिपा था,
ये बात आज समझ आई है|
आज फिर तू याद आई है||

मेरे रूठ जाने पर,
तेरा मुझे मनाना,
मेरी पसंद का खाना बनाकर मुझे खिलाना,
तेरे हाथों से बने खाने का स्वाद,
न अब तक ये ज़ुबाँ भूल पाई है|
आज फिर तू याद आई है||

बीमार मेरे पड़ने पर,
तेरा खुद को भूल जाना|
सारे काम छोड़,
बस मेरा दिल बहलाना|
मेरी चिंता में न जाने,
कितनी रातें तू न सो पाई है|
आज फिर तू याद आई है||

उन सर्द रातों में,
तेरा बार बार जगना,
नंगे ही पैर,
मेरे कमरे की तरफ भागना,
ये सोच के, कि रज़ाई,
मैंने फिर फर्श पे गिराई है|
आज फिर तू याद आई है||

मेरी छोटी सी कामयाबी में,
खुश हो जाती थी|
मेरी बनाई साधारण सी,
तस्वीरें भी तुझे कितना भाती थीं|
मेरे लिए दुनिया सी लड़ने वाली,
मौत से न लड़ पाई है|
आज फिर तू याद आई है||
“माँ”, आज फिर तू याद आई है||

“ये दूरी एक तपस्या है”

ये विरह बड़ी समस्या है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

जो किया क्या वो सही किया?
जो जिया क्या वो सही जिया?
तू प्रश्न हमेशा करती है,
मैं उत्तर न दे पाता हूँ,
कि होनी एक अटल अवस्था है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

मैं कटे फूल सा मुरझाया,
तू बिन बारिश धरती सी है|
मैं सांसों का एक चलता साया,
तू रुकी हुई नदिया सी है|
अनसुलझी सी एक व्यथा है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

दो जिस्म भले हम दिखते हों,
आत्मा तो अपनी एक है|
दिल दो भले धड़कते हों,
धड़कन तो उनकी एक है|
फिर एक जैसी ही तो तमन्ना है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

तुझ संग मैं बाग़ सा खिलता हूँ,
और तू कली सी महकती है|
मैं प्रेम गगन में उड़ता हूँ,
जहाँ तू चिड़िया सी चहकती है|
बेसब्र मिलन की इच्छा है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

पर तुझको याद दिला दूँ मैं,
सब दिन एक जैसे न होंगे|
तुझको ये बात बता दूँ मैं,
हम दूर हमेशा न होंगे|
कि हर पल में यही दुआ है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

मैं ऐसे तो न जलता

मेरी तन्हाई की उमस को,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|
मेरे सूने दिल को,
तेरी धड़कनों की आवाज़ मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता||

तेज़ धूप में सूखा पत्ता जल जाता है,
शमां की गर्मी से मोम पिघल जाता है,
जो तू पास होती..
मैं वो पत्ता, वो मोम तो न बनता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

जहाँ लाल दिखे सिर्फ वहीँ तो आग नहीं होती,
मेरी ख़ामोशी तो बिन रंग जला करती है,
जो तू पास होती..
मैं इस तरह से खामोश तो न रहता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

ये जीवन ऐसी माचिस की डिबिया है,
ये दिन रात उस डिबिया की तीलियाँ हैं,
नित जलती तो हैं पर बुझती नहीं,
जो तू पास होती..
मेरा कोई पल ऐसी तीली न बनता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

जब बादलों से छन के धूप निकलती है,
साये से ढंकी ये धरती फिर चमकती है,
जो तू पास होती..
मैं इस तड़प के साये में तो न बसता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

बिन बरसात मैंने इस धरती को जलते देखा है,
बिन आंसुओं के उसे रोते देखा है,
जो तू पास होती..
मैं बारिश की वैसी आस तो न बनता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

किसी बात में ये दिल नहीं लगता,
तुझसे लगा है बस तुझे चाहता है,
जो तू पास होती..
मैं अपने दिल के आगे यूँ बेबस तो न रहता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

बरसों से इन सांसो में एक तेज़ गति है,
जाने कब से एक हलचल सी मन में बसी है,
जो तू पास होती..
मैं हमेशा ऐसे बैचेन तो न रहता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

जब भी तेरी याद आ जाती है,
सिर्फ दिल नहीं, रूह नहीं,
जिस्म के हर रेशे से टकराती है,
जो तू पास होती..
मैं हर घडी ये चोटें तो न सहता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|

लगता नहीं कि ज़िन्दगी अब ऐसे चल पायेगी,
या मैं जी पाउँगा या बस जलन रह जाएगी,
कि जो तू पास होती..
मैं ऐसे जल जल के तो न जीता,
तेरे प्यार की कुछ बूंदें ही मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता|
मेरे सूने दिल को,
तेरी धड़कनों की आवाज़ मिल जाती..
मैं विरह से ऐसे तो न जलता||

मेरी तमन्नाएँ

मेरी तमन्नाएँ,
ये मुझसे कुछ कहती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

कभी तेज़ किसी तूफान सी,
मेरे मन में उठती जाती हैं|
इस जग माया के जंगल में,
कभी कई दिनों खो जाती हैं|
कभी दर्द दे जाती हैं,
कभी मरहम बन जाती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

मैं कुछ भी न कह पाऊं,
कभी चुप सा कर देती हैं|
मैं उन्हें ही जपता जाऊं,
कभी चुप ही नहीं होती हैं|
कभी खिलखिला देती हैं
कभी मायूस हो जाती हैं,
कभी पास नज़र आती हैं,
कभी दूर चली जाती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

तुम सबके मन की करते हो,
न अपने दिल की सुनते हो|
सब ही तुमको क्यूँ प्यारे हैं,
एक हम ही क्यूँ पराये हैं?
एक ताना दे जाती हैं,
एक कटाक्ष कर जाती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

और मैं ये समझाता हूँ,
अभी समय नहीं आया है|
मैं इनको बतलाता हूँ,
संदेहों का साया है|
इतना आसान ही होता,
जो चाहते वो कर जाते|
इतना आसान ही होता,
जो चाहते वो पा जाते|
मेरी आखें नम  जाती हैं,
फिर पलकें झुक जाती हैं|
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

मेरी तमन्नाएँ,
ये मुझसे कुछ कहती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

तेरी राह पे मैं चल दूँ

पलकों को बंद करके
तेरी तस्वीरों को याद करके,
बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

इन आखों से जो दिखती है
एक बेरंग सी दुनिया है,
“कागज़ों” के पीछे चलती
बड़ी बेढंग सी दुनिया है,
तेरी आँखों को याद करके
रौशनी से मैं मिल लूँ
बस बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

यहाँ हवा ठहरी सी है
दीवारों में जकड़ी सी है,
छाँव तो मुझे कहीं दिखी नहीं
बस धूप ही बिखरी सी है,
तेरी ज़ुल्फ़ों को याद करके
ठंडी छाँव से मन भर लूँ
बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

तेरे महके से आँगन में
पतझर में भी फूल खिलते हैं,
किरने भी और दमकती हैं
बादल भी खूब बरसते हैं,
तेरे आँचल को याद करके
उसे छूने को फिर तरसूं
बस बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

कभी एक शोर सा सुनता हूँ
कभी ख़ामोशी में बहता हूँ,
पागल एक परिंदे सा
बस उड़ता न ठहरता हूँ,
तेरी आवाज़ याद करके
एक राहत सी मैं सुन लूँ
बस बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

कितनी ही राहें जाती हैं
कुछ सीधी कुछ मुड़ जाती हैं,
कब से मैं ढूंढू राह तेरी
जो बस तुझ तक लेके जाती है,
खुली पलकों से जो दिखी नहीं
बंद नज़रों से दिख जाती है
वो अकेली राह ही मैं चुन लूँ
बस बेख्याल सा चल दूँ
तेरी राह पे मैं चल दूँ ||

सपनों की पतंगें

ख्वाहिशों की डोर से
सपनों की पतंगें उड़ा लेता हूँ,
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

मेरे पास सपनों की
कई रंग बिरंगी पतंगें हैं
कुछ सस्ती कुछ महँगी
कुछ छोटी कुछ बड़ी पतंगें हैं
इस जहाँ में उनकी कोई दुकान नहीं
तो अपने ही मन से उन्हें खरीद लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

एक सपने की पतंग
कभी सुबह उडाता हूँ,
तो दूसरे सपने की पतंग
शाम को लहराता हूँ
रात नींद की बाँहों में
ये सारी पतंगें सहेज लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

वक़्त की ये हवा
जब धीमी सी बहती है,
मेरी कोई एक पतंग
कभी उड़ती कभी गिरती है
उम्मीद की थपकी से
उसे थोड़ा-थोड़ा बढ़ा लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

आकांक्षाओं के आकाश में
अनगिनत ऐसी पतंगें उड़ती होंगी
कुछ साथ-साथ बढ़ती
तो कुछ साथ-साथ कटती होंगीं
मेरी भी पतंग कहीं कट के गिर न जाये
कभी दाएं कभी बाएं
एक तेज़ खेंच से उसे बचा लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

ख्वाहिशों की डोर से
सपनों की पतंगें उड़ा लेता हूँ,
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

तेरी याद परछाई सी मेरे साथ रहती है

कभी आँखों में आस बनकर रहती है
कभी ख्वाबों में ख्याल बनकर रहती है
तेरी याद है कि हर वक़्त
मेरी परछाई सी मेरे साथ रहती है

कभी इस डगर, कभी उस डगर तुझे ढूंढता हूँ
जिधर भी ये नज़रें मुड़ें, उस तरफ तुझे ढूंढता हूँ
मेरे सब्र का बांध, है हर दिन टूटता
और हर दिन, उसे जोड़कर तुझे ढूंढता हूँ
मेरे करीब न होकर भी, तू मेरे सबसे पास रहती है
तेरी याद है कि हर वक़्त
मेरी परछाई सी मेरे साथ रहती है

मैं कहूँ कि सांसें आती जाती हैं तो में जीता हूँ
मैं कहूँ कि ये धड़कनें चलती हैं तो मैं जीता हूँ
मैं ये सब कहूँ तो मैं गलत कहता हूँ
क्योंकि अगर तेरे ख्याल में रहता हूँ तो मैं जीता हूँ
अगर तेरे खुमार में खोता हूँ तो मैं जीता हूँ
एक पागलपन के जैसी मेरे सर पे सवार रहती है
तेरी याद है कि हर वक़्त
मेरी परछाई सी मेरे साथ रहती है

तुझे भी पता है तू साथ न होगी तो चैन न मिलेगा
तुझे इल्म है तू न मिलेगी तो सुकून न मिलेगा
मेरे हर ख़्याल में तू हमसफ़र रही है
बिन तेरे ये सफर चलना पड़ा तो सुकून न मिलेगा
एक वही है जो हर कदम मेरा सहारा बनती है
तेरी याद है कि हर वक़्त
मेरी परछाई सी मेरे साथ रहती है

इस जग में नव संसार मिला

धरती के जैसी सुन्दर तुम
गंगाजल जैसी पावन तुम
एक कली के जैसी कोमल हो
हो अब खुशियों का आंगन तुम
तुम्हें पाकर जीवनसार मिला |
इस जग में नव संसार मिला ||

सागर लहरों सी चंचल तुम
चांदनी से ज्यादा शीतल तुम
संगीत की मधुर कोई सरगम हो
फूलों जैसी मनमोहक तुम
हमें ईश्वर से सुन्दर उपहार मिला |
इस जग में नव संसार मिला ||

प्रकाश के दिव्य रथ पर
वो भानु जैसे सुशोभित है
आभा से तेरे मस्तक की
मेरा अंतःकरण वैसे प्रकाशित है
रग रग को एक आनंद मिला |
इस जग में नव संसार मिला ||

तेरी पलकों की छाव में
जीवन का अब हर दांव है
प्यारी गहरी इन आखों में
जैसे स्वर्ग का सुन्दर गाँव है
समर्पण का नव भाव मिला |
इस जग में नव संसार मिला ||

जब गोद में तुम सो जाती हो
मेरी हर चिंता हर जाती हो
फिर प्यार से जब अंगड़ाई लो
बन मुस्कान अधरों पे आती हो
मुझे प्यार से प्यारा प्यार मिला |
इस जग में नव संसार मिला ||

नन्हे छोटे से हाथों की
मुट्ठी में बंद कुछ सपने हैं
तुझे छू के मुझे अहसास मिले
वो सपने पूरे करने हैं
मेरे मन को नव विश्वास मिला |
इस जग में नव संसार मिला ||

जब से जीवन में आई हो
बस मन-मंदिर में छाई हो
लक्ष्मी के जैसे चरन-कमल
“समृद्धि” का संदेसा लाई हो
तेरे जैसा तेरा नाम मिला |
इस जग में नव संसार मिला ||
तुम्हें पाकर जीवनसार मिला |
इस जग में नव संसार मिला ||

कहीं कुछ खाली सा है

आँखों से सब भरा सा दिखता है,
पर अंदर कहीं कुछ खाली सा है |
जीवन में भले कुछ कमीं नहीं,
फिर भी मन कहीं खोया सा है ||

ये रौशनी जो दिखती है,
वो कहीं अँधेरा तो नहीं,
जिस अँधेरे में जाने से डरता हूँ,
वहीँ कोई सवेरा तो नहीं,
जो कुछ मुझे साफ दिखता है,
लगता है वो कुछ धुंधलाया सा है |
जीवन में भले कुछ कमीं नहीं,
फिर भी मन कहीं खोया सा है ||

अभी तक जो मंजिलें मिली हैं,
वो बस कुछ शुरुआत तो नहीं,
अभी तक जो रास्ते मैं चला हूँ,
वो कोई भूलभुलैया तो नहीं,
जो भी मैंने अब तक हासिल किया,
लगे कि कुछ तो उसमें पराया सा है,
जीवन में भले कुछ कमीं नहीं,
फिर भी मन कहीं खोया सा है ||

सांसों की गिनतियाँ अब कम हो रही हैं,
ज़िन्दगी से चाहतें कुछ कम हो रही हैं,
अपने ही सवालों में कुछ उलझा हूँ ऐसे,
जैसे ज़िन्दगी एक भंवर हो रही है,
जो कुछ भी मैंने देखा या समझा,
लगता है जैसे सब झुठलाया सा है,
आँखों से सब भरा सा दिखता है,
पर अंदर कहीं कुछ खाली सा है |
जीवन में भले कुछ कमीं नहीं,
फिर भी मन कहीं खोया सा है ||