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“कांग्रेस को फिर से हराना है”

साठ साल से ज्यादा ही
जो राज सदा करते आये,
भारत माता की छाती पर
सांप लोटते ही आये,
जनता तो ये सोचे थी कि
वे नवयुग को लाएंगे,
ऐसा क्या आभास था वे
इस देश का मान गिराएंगे,
उन नेताओं के वंशज को,
हमें अब सबक सिखाना है,
देश को हमें बचाना है
कांग्रेस को फिर से हराना है ||

जाति धर्म में बाँट बाँट
जो लोगों को छलते आये,
झूठी मनमोहक नीतियों से
बस मनमुटाव करते आये,
अंग्रेज़ों ने जिस तरह से
देश को कभी बांटा था,
उसी तरह से देश राज्य को
छिन्न भिन्न करते आये,
तुम कश्मीरी, तुम दलित,
तुम माइनॉरिटी, आदिवासी हो,
कभी न कहा कि हे मनुज
तुम एक ही भारतवासी हो,
और तब भी बिन लज्जा के
खुद को सेक्युलर वे कहते हैं,
धर्मनिरपेक्षता की भगवन ये
कैसी परिभाषा कहते हैं,
झूठे वादे, प्रलोभनों की
बातों में अब नहीं आना है,
भारत मां को हमें बचाना है,
कांग्रेस को फिर से हराना है ||

दशकों तक तुमने राज किया
न विकास किया, न काम किया,
भृष्टाचार में लिप्त रहे
बस आराम किया, आराम किया,
जन जनता की एक पार्टी को
एक घर की पार्टी बना दिया,
जो तुम सा बोले वही ठीक
विपरीत को बंदी बना दिया,
और कहते हो कि इस देश में
न्याय बस कांग्रेस करती है,
और अन्याय से किस तरह
पहचत्तर का आपातकाल लगा दिया,
भर भर के तुमने घाव दिए
इस राष्ट्र को अब नहीं सहना है,
स्वयं को हमें बचाना है,
कांग्रेस को फिर से हराना है ||

घोटालों की बात चले
तो जिव्ह्या ही थक जाती है,
बोफोर्स, कोल्, टूजी, हेराल्ड
कहने में शर्म आ जाती है,
गाँधी, पटेल की पार्टी में
ये कैसे नेता आते गए,
जिस थाली में खाते गए
उसी में छेद बनाते गए,
कोई हिम्मत न कर पाया
ऐसे लोगो को फांसी दे,
कुछ न हो तो कम से कम
पार्टी से विदा करा ही दे,
पर ना तिलक, ना बोस ही
अब इस पार्टी को संभाले हैं,
संसद की गरिमा लजाते
कुछ नेता पार्टी चलाते हैं,
ऐसे किसी नेता को अपना
प्रतिनिधि नहीं बनाना है,
लोकतंत्र को हमें बचाना है
कांग्रेस को फिर से हराना है ||

इस पार्टी के नेताओं से
कुछ प्रश्न में करना चाहता हूँ,
क्यों चुन लूँ मैं कांग्रेस को,
ये निर्णय करना चाहता हूँ,
क्या किया उन नेताओं का
जो घोटाले करते गए,
क्या किया उन निर्लज्जों का
जो राष्ट्र सम्पदा हरते गए,
क्यों न रोका उन बोलों को
जो सेना का मनोबल गिराते हैं,
उन्हीं पे उंगली उठाते हैं
जो दुश्मन से हमें बचाते हैं,
राष्ट्र विरोधी तत्वों से
क्यों आप हाथ मिलते हैं,
सत्ता हासिल करने को
किस हद तक गिरते जाते हैं,
साफ़ छवि के एक नेता को
चोर चोर चिल्लाते हैं,
न्यायपालिका के निर्णयों को
मान क्यों नहीं पाते हैं,
कब तक सहारे झूठ के
राजनीति करते जाओगे,
कब सदाचार सतआचरन से
पार्टी को साफ़ बनाओगे,
इन प्रश्नों के उत्तर मिलना
सहज नहीं ये माना है,
राष्ट्रवाद को हमें बचाना है,
कांग्रेस को फिर से हराना है ||
कांग्रेस को फिर से हराना है ||

-ईशांश

मेरी तमन्नाएँ

मेरी तमन्नाएँ,
ये मुझसे कुछ कहती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

कभी तेज़ किसी तूफान सी,
मेरे मन में उठती जाती हैं|
इस जग माया के जंगल में,
कभी कई दिनों खो जाती हैं|
कभी दर्द दे जाती हैं,
कभी मरहम बन जाती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

मैं कुछ भी न कह पाऊं,
कभी चुप सा कर देती हैं|
मैं उन्हें ही जपता जाऊं,
कभी चुप ही नहीं होती हैं|
कभी खिलखिला देती हैं
कभी मायूस हो जाती हैं,
कभी पास नज़र आती हैं,
कभी दूर चली जाती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

तुम सबके मन की करते हो,
न अपने दिल की सुनते हो|
सब ही तुमको क्यूँ प्यारे हैं,
एक हम ही क्यूँ पराये हैं?
एक ताना दे जाती हैं,
एक कटाक्ष कर जाती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

और मैं ये समझाता हूँ,
अभी समय नहीं आया है|
मैं इनको बतलाता हूँ,
संदेहों का साया है|
इतना आसान ही होता,
जो चाहते वो कर जाते|
इतना आसान ही होता,
जो चाहते वो पा जाते|
मेरी आखें नम  जाती हैं,
फिर पलकें झुक जाती हैं|
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

मेरी तमन्नाएँ,
ये मुझसे कुछ कहती हैं,
एक सवाल पूछती हैं,
एक जवाब मांगती हैं|

सपनों की पतंगें

ख्वाहिशों की डोर से
सपनों की पतंगें उड़ा लेता हूँ,
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

मेरे पास सपनों की
कई रंग बिरंगी पतंगें हैं
कुछ सस्ती कुछ महँगी
कुछ छोटी कुछ बड़ी पतंगें हैं
इस जहाँ में उनकी कोई दुकान नहीं
तो अपने ही मन से उन्हें खरीद लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

एक सपने की पतंग
कभी सुबह उडाता हूँ,
तो दूसरे सपने की पतंग
शाम को लहराता हूँ
रात नींद की बाँहों में
ये सारी पतंगें सहेज लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

वक़्त की ये हवा
जब धीमी सी बहती है,
मेरी कोई एक पतंग
कभी उड़ती कभी गिरती है
उम्मीद की थपकी से
उसे थोड़ा-थोड़ा बढ़ा लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

आकांक्षाओं के आकाश में
अनगिनत ऐसी पतंगें उड़ती होंगी
कुछ साथ-साथ बढ़ती
तो कुछ साथ-साथ कटती होंगीं
मेरी भी पतंग कहीं कट के गिर न जाये
कभी दाएं कभी बाएं
एक तेज़ खेंच से उसे बचा लेता हूँ |
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||

ख्वाहिशों की डोर से
सपनों की पतंगें उड़ा लेता हूँ,
कभी हलके, कभी कसे
अपनी मेहनत के कन्ने बांध लेता हूँ ||