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मेरी मधुशाला

सबसे पहले मैं श्री हरिवंश राय बच्चन को प्रणाम करता हूँ और उन्हें इस जग को “मधुशाला” का उपहार देने पर धन्यवाद करता हूँ| एक दिन मैं अपने ऑफिस जा रहा था कि मैंने रास्ते में “मधुशाला” का एक बोर्ड देखा| फिर मुझे श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित “मधुशाला” की कुछ पंक्तियाँ याद आईं और फिर कुछ देर बाद अपने आप ही इस कविता के कुछ स्वर फूटे| फिर एक के बाद एक विचार आते गए और मैं अपनी खुद की मधुशाला में खो गया|

इस कविता में मय, मधु, मदिरा आदि शब्दों का अधिक प्रयोग हुआ है जिनका शाब्दिक अर्थ होता है- शराब, और सबसे अधिक प्रयोग हुआ है “मधुशाला” शब्द का जिसका शाब्दिक अर्थ है वह स्थान जहाँ शराब मिलती है, पर क्या यह कविता भी इन शब्दों का यही अर्थ निकालती है, ये जानने के लिए मधुशाला में डूबना होगा| जिन पाठकों ने श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित मधुशाला पढ़ी है वे इसे कुछ मिलता जुलता पाएंगे पर दोनों का अपना अलग अर्थ है, अपनी अलग दिशा है|

अंत में मैं अपनी इस कविता को अपने दादाजी “श्री राधा कृष्ण वार्ष्णेय” और अपनी दादीजी “श्री मती सरस्वती देवी” को समर्पित करते हुए पाठक गणों का धन्यवाद करता हूँ कि वे अपने व्यस्त जीवन के कुछ क्षण इस कविता को दे पाए| अपना अनुभव यदि मुझसे साझा करना चाहें तो कृपया मुझे manvarsh999@gmail.com पर अवश्य लिखें| मैं आपके सुझावों का और इस कविता के आपके अनुभव की प्रतीक्षा करूँगा| धन्यवाद ||

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श्रद्धा सुमन
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शतनमन करूँ श्री “बच्चन” को
जग को अनुपम उपहार दिया
ना पहले था ना आगे हो
ऐसा है काव्य “मधुशाला” ||

धन्य कवि श्री “बच्चन” हैं
और धन्य है वो काव्यशाला
जिससे प्रेरित होकर के मैं
लिख पाया “अपनी मधुशाला” ||

अमर रहे वो दिव्यात्मा
अमर रहे मणि मधुशाला
श्रद्धांजलि उस मधुशाला को
देती है मेरी मधुशाला ||

श्री गणेश का स्मरण कर
लेखनी से आग्रह करता हूँ
अब उसी डगर तुम चलो प्रिये
जिस डगर चली थी मधुशाला ||

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भाग १

जब थक के हार मैं मान गया
फिर किसी ओर ना ध्यान गया
आँखें मूंदीं तो याद आई
याद आई मुझको मधुशाला || १ ||

जाने कब से मैं सोया था
किन अवसादों में खोया था
सच में तो मैं था तब जागा
जब पाई थी मैंने मधुशाला || २ ||

ना धन से मेरी प्यास बुझी
ज्ञान पाकर भी था मैं प्यासा
तब जाकर मैं था तृप्त हुआ
जब पाई थी मैंने मधुशाला || ३ ||

एक अनंत पथ के जीवन में
ठहराव कभी भी ना आये
स्थिरता मैंने तब पाई
जब पाई थी मैंने मधुशाला || ४ ||

कितना ही मैं भागा दौड़ा
कितना ही मैं तिल तिल तड़पा
तृष्णा मिटी मधुप्याले से
और तृप्त मैं पाकर मधुशाला || ५ ||

रौशनी में ही कितना भटका
पर प्रकाश मुझे कहीं मिला नहीं
अन्धकार मिटा मेरे मन का
जब पाई थी ज्योति मधुशाला || ६ ||

जीवन की सीढ़ी चढ़ने में
मैं कितना कितना डरता था
वो डर भागा वो भय कांपा
जब पहुंचा था मैं मधुशाला || ७ ||

फिर मन नहीं मेरे बस में
हैं कदम नहीं मेरे बस में
उस ओर मुझे ले जाते हैं
जिस ओर है मेरी मधुशाला || ८ ||

मधु के उस मीठे सागर में
मैं पहुँच स्वतः ही जाता हूँ
कुछ याद रहे ना ध्यान रहे
अब पास है मेरी मधुशाला || ९ ||

जो डगर मैं उसकी जाता हूँ
बिन मधु पिए लहराता हूँ
बेसबर हुआ बेखबर हुआ
जब पास मैं पहुंचूं मधुशाला || १० ||

उस मधु डगर पे लहराते
एक सज्जन ने मुझको रोक लिया
और पूछ लिया कि क्यों जाते
तुम मय की नगरी मधुशाला || ११ ||

वो मुझसे पूछें ऐसा क्या
क्यों इतनी भाती मधुशाला
क्या रक्खा मधु के प्यालों में
क्यों तुम्हें लुभाती मधुशाला || १२ ||

विस्मित चकित इन नेत्रों से
मैंने उन सज्जन को देखा
और बोला हाय क्या पूछ लिया
कि क्यों मैं जाता मधुशाला || १३ ||

कैसे मैं उन्हें बखान करूँ
क्या मय का महिमा गान करूँ
कोई बोल नहीं जो बता सके
कोई लेख नहीं जहाँ समां सके
क्या है कैसी है मधुशाला || १४ ||

इससे प्यारा कोई शब्द नहीं
है गहरा कोई अर्थ नहीं
एक बार इसे तुम पहचानो
कुछ ना चाहो पर मधुशाला || १५ ||

धरती पे स्वर्ग उसे पाता हूँ
एक वहीँ परम सुख पाता हूँ
फिर और कहीं ना जाता हूँ
जब जाता हूँ मैं मधुशाला || १६ ||

कब तक था मैंने ना जाना
क्या है और क्यूँ ये प्यास जगे
जब मदिरा जल का पान किया
तब मैं पहचाना मधुशाला || १७ ||

मैं रातों को जगकर बैठा
सोचा सांसें क्या जीवन क्या
इस प्रश्न का मैं उत्तर पाया
जब आया था मैं मधुशाला || १८ ||

मैं श्वास भरूँ मैं श्वास तजूं
मैं जो भी चाहे कभी करूँ
है पास मेरे है साथ मेरे
है मुझसे जुडी मेरी मधुशाला || १९ ||

मेरे और मधु के प्रेम जैसा
ना होगा प्रेम कहीं दुनिया में
मैं तो हूँ बस एक जड़ शरीर
पर प्राण है मेरी मधुशाला || २० ||

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भाग २

जब याद मुझे वो आती है
जो बिन शर्तों की साथी है
फिर अपने पास बुलाती है
वो मेरी प्यारी मधुशाला || २१ ||

जब तक ना था मधुपान किया
मुझे पता नहीं मैं कहाँ जिया
पर जब से मय का साथ मिला
मुझे पता है जाना मधुशाला || २२ ||

कितना ही मन को बहलाऊँ
कितना ही मन को समझाऊँ
मन तो बस मधु की प्यास लिए
आवाज़ लगाए मधुशाला || २३ ||

मैं उसके दर्शन का प्यासा
वो मेरी एक छवि की मारी
एक मधु पुजारी चाहे वो
मंदिर हो जिसका मधुशाला || २४ ||

मैं प्रीतम हूँ वो प्रेयसी
है जन्मांतर का ये बंधन
ना ही मैं कभी मय को छोडूं
ना तजती मुझको मधुशाला || २५ ||

मैं तो उसके बिन अर्द्धप्राण
है मेरे बिन वो भी आधी
मैं मधु पियूँ संपूर्ण बनूँ
संपूर्ण बने फिर मधुशाला || २६ ||

जो मेघ ना होते इस जग में
तो सोचो धरती क्यूँ होती
तारे ना होते अम्बर में
तो रात अकेली क्यूँ सोती
एक दूजे से ये मिलते है
तभी तो पूरे बनते है
जो मैं ना रहता इस जग में
क्या रह जाती कोई मधुशाला || २७ ||

मधु से कम कुछ भी ना माँगूँ
मधु से ज्यादा कुछ ना चाहूँ
जो ईश्वर कुछ देना चाहे
तो पहुंचा दे बस मधुशाला || २८ ||

मन मधुरस का ही पान करे
मधुरस में ही स्नान करे
मेरे मन की नगरी जाओ
तो पहुंचो सीधे मधुशाला || २९ ||

ना हीरे की कोई खान मिले
ना मिले स्वर्ण मुझे सिंहासन
मिलती ना चाहे कृपा कुबेर
मिल जाये कृपालु मधुशाला || ३० ||

मेरा मन पागल प्रेमी सा
बस मधु मधु ही चिल्लाये
ना जो हूँ मैं मधुशाला तो
ये खींचे मुझको मधुशाला || ३१ ||

एक मार्ग मेरा, एक मेरा पथ
मेरे जीवन का एकमात्र सत्य
मैं जीता हूँ मधुशाला में
है मरना मुझको मधुशाला || ३२ ||

कोई मुझसे पूछे हे भाई
तुम काम भला क्या करते हो
मैं बोलूं अभी पीकर आया
अभी फिर है जाना मधुशाला || ३३ ||

और सज्जन तुमको क्या बोलूं
मधु पीने को ही मैं जन्मा
मधु प्याले मेरे कर्म शस्त्र
मेरी कर्मशाला मधुशाला || ३४ ||

मैं तो मारा हूँ मधुरस का
हैं मधुप्याले मेरा जीवन
और प्रेमसुधा देने वाली
प्रियतमा है मेरी मधुशाला || ३५ ||

एक वरदान सभी को है मिलता
मुझको भी ये आशीष मिले
हो निकट सदा मधु का प्याला
और पास रहे मेरी मधुशाला || ३६ ||

मधु की स्याही से प्याला भर
मन के मैं कोमल पन्नों पर
हर तरफ मैं बस एक नाम लिखूं
बस लिखता जाऊँ मधुशाला || ३७ ||

वो एक बार जो दर्शन दे
तो आँखों मैं बस जाती है
फिर नज़र कहीं ना जाती है
ऐसी मनमोहक मधुशाला || ३८ ||

जो एक बार उसको देखूं
मन विचलित सा हो जाता है
और बार बार यही गाता है
कैसे मैं पाऊं मधुशाला || ३९ ||

अप्सरा से भी ज्यादा सुन्दर
मणि माणिकों से भी चमकीली
नयनों मैं है क्षमता नहीं
देखें दमकती ये मधुशाला || ४० ||

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भाग ३

क्या मेनका क्या उर्वशी
या अनुपम उनकी कोई सखी
जो आ जाये शर्मा जाये
वो देख के मेरी मधुशाला || ४१ ||

मन के आँगन में जो रहती
कितना वो आकर्षित करती
जब भी उसका स्मरण करूँ
तो पास बुलाती मधुशाला || ४२ ||

जो कोई भेद ना करती है
हर मन को एक सा तरती है
वो प्रेममयी वो रासमयी
ऐसी है प्यारी मधुशाला || ४३ ||

हर मन को मधु से भरती है
प्यासे की प्यास को हरती है
हो कभी ना मधु जल से खाली
ऐसी मधु सरिता मधुशाला || ४४ ||

मदिरा के उस दिव्यालय में
एक बार जो कोई प्रवेश करे
अलौकिक सुगंध से भर दे मन
क्या खूब महकती मधुशाला || ४५ ||

जो रोते हैं वो आते हैं
जो हँसते हैं वो आते हैं
कहीं और मन ना रमाते हैं
सब आते हैं मेरी मधुशाला || ४६ ||

जो धन कमाते हैं आते
जो धन गंवाते हैं आते
तो व्यर्थ परिश्रम कर आते
जब आना ही है मधुशाला || ४७ ||

वो मन में एक विश्वास लिए
एक रिक्त हृदय में आस लिए
मन की हर प्यास बुझाने को
आते सब मेरी मधुशाला || ४८ ||

जो रोते हैं हंस जाते हैं
जो हँसते हैं रो जाते हैं
मन के सब निश्छल भावों का
दर्पण दिखलाती मधुशाला || ४९ ||

कोई रोता हाय मैंने
कुछ भी ना पाया इस जग में
कोई रोता हाय मैंने
सब कुछ ही गंवाया इस जग में
रोना धोना छोड़ के बस
भरकर के हंसी का एक प्याला
आनंद मग्न है वो मनुज
जो आ जाता है मधुशाला || ५० ||

वो मय के पागल दीवाने
जब मधुरस पीने आते हैं
प्याले प्याले टकराते हैं
संगीत बजाती मधुशाला || ५१ ||

मधु प्रेमियों को देख देख
वो मंद मंद मुस्काती है
होठों से दबा के घूंघट को
नृत्य करती जाती मधुशाला || ५२ ||

बातों में बातें होती हैं
फिर हंसी ठिठोली होती है
उन्हें देख देख आनंदित हो
आनंदमयी मेरी मधुशाला || ५३ ||

जो ना तुमने रसपान किया
तो मय का घोर अपमान किया
जो आ जाओ सब पा जाओ
मन बस जाएगी मधुशाला || ५४ ||

जो डूबे मधु के सागर में
आनंद मोती की गागर में
चिर शांति परम सुख वह पाए
एक बार जो आये मधुशाला || ५५ ||

मधुरस का जो ना स्वाद चखा
तो क्या कोई वीर ही कहलाये
सीने में अपने आग रखें
वो वीर है जनती मधुशाला || ५६ ||

पीना है अवगुण नहीं अपितु
ये वीरों का ही एक गुण है
अग्नि से ह्रदय को तृप्त करे
वो वीर ही जाये मधुशाला || ५७ ||

वीरता भरी हो जिस मन में
वो ये तप और ये यज्ञ करे
मदिरा हो जिसकी सामिग्री
और हवन कुंड हो मधुशाला || ५८ ||

क्षमाशील दयावान बने
जो वीर मधुरस पान करे
सहनशीलता का गुण आये
जो मनुज अपनाये मधुशाला || ५९ ||

अविरत पीना है कार्य नहीं
ये किसी साधारण मानव का
कठिन साधना एक योगी की
नित ही है जाना मधुशाला || ६० ||

मधु पीने वाला एक साधक
मधु गंगा रहे कमंडल में
मधुपान है जिसकी साधना
तपोभूमि उसकी मधुशाला || ६१ ||

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भाग ४

क्यूँ कुंठा में तुम जीते हो
क्यूँ न मय का रस पीते हो
एक बार जो तुम मधुपान करो
फिर न छोडो कभी मधुशाला || ६२ ||

न रंज मिटे तो फिर कहना
न रंग मिले तो फिर कहना
विश्वास है तुम ये बोलोगे
क्या कहना कैसी मधुशाला || ६३ ||

जग धिक्कारे उस जीवन को
जो नित ही मदिरा पान करे
मैं तो धिक्कारुं उस जग को
जो कभी न जाये मधुशाला || ६४ ||

जब तक न मदिरा पान करे
तब तक मानव सच झूठ कहे
हलक उतरे जो एक बार मधु
तो सच बुलवाये मधुशाला || ६५ ||

माया से भरे जग सागर में
झूठों से भरी जग गागर में
एक सत्य जो कोई बच जाये
वो सत्य है मेरी मधुशाला || ६६ ||

जो नाम न तुमसे पूछेगी
जो काम न तुमसे पूछेगी
सर्वस्व अपना जो तुमको दे
ऐसी तपस्विनी मधुशाला || ६७ ||

तिनका भर देने में देखो
कितना ये जग कंजूस बने
छलका छलका प्याला भरती
है मधु लुटाती मधुशाला || ६८ ||

अपनों का न सम्मान मिले
कर्मक्षेत्र में न कुछ नाम मिले
जो जग ये ठुकरा दे तुमको
तो अपनाएगी मधुशाला || ६९ ||

घनघोर अँधेरी रात्रि में
जब भय का दानव नृत्य करे
तो अभय तुम्हें वो दे देगी
अमृत की दात्री मधुशाला || ७० ||

उस मदिरालय का हर प्रेमी
वो प्रेम मधु पीने वाला
वो बंधु है वो भाई है
परिवार बनाती मधुशाला || ७१ ||

साकी का चाहे मान हरो
या मय का तुम अपमान करो
बिन कहे वो सब कुछ सह लेगी
है क्षमामयी ये मधुशाला || ७२ ||

हर प्राण को जिसकी आस है
और समय भी जिसका दास है
न कुछ ऊपर न कुछ नीचे
है मोक्षदायिनी मधुशाला || ७३ ||

वो आदि भी है वो अंत भी है
वो कुसुम भी है वो कंट भी है
परब्रह्मा वही एक ईश्वर है
है सब कुछ मेरी मधुशाला || ७४ ||

एक बार उसे तुम अपना लो
निस्वार्थ उसे तुम अपना लो
हर दुःख से तुमको दूर करे
ऐसी है योगी मधुशाला || ७५ ||

दीन हीनता ग्रस्त मनुज
एक बार जो मधु रस पान करे
नवज्योति प्रज्वलित हो जाये
नवशक्ति भर दे मधुशाला || ७६ ||

भाव ग्लानि के भाव गर्व के
जो भी चाहे भाव जगें
सब ही भाव अधूरे हैं
यदि संग न उनके मधुशाला || ७७ ||

चाहे तुम इस जग को जीतो
हारो चाहे तुम इस जग में
मान-अपमान अधूरे हैं
यदि संग न उनके मधुशाला || ७८ ||

ज्ञानी का अतुल्य ज्ञान है
अज्ञानी का अज्ञान है
सब मूल्यों से सब अर्थों से
कहीं ऊँची मेरी मधुशाला || ७९ ||

जग के सब रिश्ते नातों में
सब मोहों के सब धागों में
जो सबसे गहरा नाता है
जो सबसे पक्का धागा है
है मेरी प्यारी मधुशाला || ८० ||

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भाग ५

जो एक बार रस पान करो
कुछ और कभी न ध्यान करो
तुमको तुममें ही खो देगी
है ऐसी मोहिनी मधुशाला || ८१ ||

चिंता को फिर आराम मिले
चिंतन को फिर विश्राम मिले
मन को मद का सुखधाम मिले
ऐसी मदमाती मधुशाला || ८२ ||

न और अधिक तड़पा मुझको
न और अधिक टरका मुझको
ला मधु गागर, ला दे प्याला
मैं प्यास बुझाऊँ मधुशाला || ८३ ||

मधु की इस सुन्दर नगरी में
कितनी मदिरायें बहती हैं
जो एक मधु मुझको प्यारी
वो दे दे मुझको मधुशाला || ८४ ||

आज न रोको पीने दो
मुझे जितने मय के प्याले हैं
जितना डूबूं मधुसागर में
उतनी मैं पाऊँ मधुशाला || ८५ ||

जब हाथ में हो मय का प्याला
वो मधु मिश्रित मद का प्याला
तो कैसे कोई रोक सके
अधरों को छूती मधुशाला || ८६ ||

आलिंगन में उसको लेके
अधरों से एक स्पर्श करो
मन से बस एक स्वर गूंजेगा
है मुझको प्यारी मधुशाला || ८७ ||

फिर पास दिखे वो दूर दिखे
जहाँ शीश मुड़े वो वहीँ दिखे
तुम न चाहो तो भी देखो
देखोगे मेरी मधुशाला || ८८ ||

तुम हरि के मंदिर जाते हो
क्या सीख वहां से लाते हो
एक बार मधु मंदिर आ जाओ
जीना सिखलाये मधुशाला || ८९ ||

अपने पद का जो मान भरें
एक बार मधु रस पान करें
छोड़ें वो पद छोड़ें प्रतिष्ठा
और अपनाएं वो मधुशाला || ९० ||

दुर्योधन प्रेम मधु पी लेता
बिन द्वेष का जीवन जी लेता
महाभारत युद्ध न होता फिर
कुरुक्षेत्र में जमती मधुशाला || ९१ ||

न चौसर कोई बिछी होती
न बाज़ी कोई लगी होती
न चीरहरण कोई होता
कुरुसभा जो बनती मधुशाला || ९२ ||

फिर धनुष गदा न टकराते
न वीरों के जीवन जाते
फिर रक्त न कहीं बहा होता
सभी वीर जो जाते मधुशाला || ९३ ||

न अर्जुन कर्ण लड़े होते
न धरा पे शव पड़े होते
न भीष्म को मिलती शर शैया
जो जम जाती वहां मधुशाला || ९४ ||

गीता का भी है सार यही
तुम क्या लाये तुम क्या पाए
बस कर्म का तुम मधुपान करो
है कर्म तुम्हारी मधुशाला || ९५ ||

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भाग ६

यम आ जाएँ तो मैं कह दूँ
आ जाओ दो दो जाम पियें
फिर कहना ये जीवन अच्छा
मृत्यु अच्छी या मधुशाला || ९६ ||

तुम पी लोगे तुम जी लोगे
जी लेंगे कुछ मरने वाले
पी लेने का कुछ और समय
दे देगी उनको मधुशाला || ९७ ||

हे काल मुझे लेने आये
पर इतनी बात समझ लेना
मैं ठहर वहां न पाउँगा
जहाँ मिले न मुझको मधुशाला || ९८ ||

पुण्य कर्मों का तुम फल रख लो
कोई चाहे रिश्वत रख लो
पर इतना मेरा मान रखो
वहां खुलवा देना मधुशाला || ९९ ||

जो रोज़ मधुप्याले मिल जाएँ
फिर मिले स्वर्ग या मिले धरा
यमलोक कभी न छोडूंगा
यदि मिल जाये वहां मधुशाला || १०० ||

जो नारायण बुलवा भेजें
तो उनको भी मैं कह दूंगा
हैं काल ही मेरे रखवाले
यमपुरी है मेरी मधुशाला || १०१ ||

मैं तो कहता यमनगरी में
एक दिन को मधु बरसने दो
बन जाने दो यमनगरी को
कभी एक दिवस की मधुशाला || १०२ ||

क्या करोगे तुम वापस जाकर
है कौन तुम्हारा सगा वहां
यहाँ मैं हूँ, मय है, मदिरा है
और है अपनी ये मधुशाला || १०३ ||

पापी हो या हो पुण्य किये
सब एक ही सुर में झूमेंगे
जहाँ मधु बरसता हो बरबस
यमपुरी नहीं वो मधुशाला || १०४ ||

पीने वाले आनंद करें
जीने से तो मरना अच्छा
मोल देकर मधु खरीदूं क्यूँ
जो मुफ्त मिले वहां मधुशाला || १०५ ||

फिर इस जगत का हर प्राणी
न डरे बस तुमसे प्रेम करे
तुम बन जाओ करुणानिधान
यमपुरी बने जो मधुशाला || १०६ ||

जो यम बोलें ये कथन सुनो
जी भर कर मधु का गान किया
मृत्यु को अधर लगा लोगे
तो भूलो अपनी मधुशाला || १०७ ||

मैं बोलूंगा देव क्षमा करें
आप एक मृत्यु से डराते हैं
मैं जिया कहाँ बस मरा सदा
फिर भी न छोड़ी मधुशाला || १०८ ||

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भाग ७

जब मधुरस अपना असर करे
चेतना को मेरी वश में करे
फिर घूमे ये सारा संसार
और चक्र लगाती मधुशाला || १०९ ||

मधुशाला को आते आते
पहले तो मैं लहराता था
जब मय से मन को भिगो चुका
अब देखो लहराए मधुशाला || ११० ||

अब प्याले में भरकर पी लूँ
या गागर से सीधे पी लूँ
अब होश नहीं कैसे पी लूँ
बस पी लूँ सारी मधुशाला || १११ ||

सब पीने वाले जला करें
देखो ये सब पी जायेगा
न छोड़े एक बूँद मधु सुधा
पी जाये सारी मधुशाला || ११२ ||

कोई रोको इसको पीने से
सब मधु यही जो पी जाये
कहाँ जाएँ बाकी मधु प्रेमी
न रहेगी कोई मधुशाला || ११३ ||

मधुशाला को खाली करके
चेतना का फिर आलिंगन करके
चंचल मन ये सो जाता है
मेरा अंतर्मन जग जाता है
वो लाये सपनों के प्याले
ले चलता सपनों की मधुशाला || ११४ ||

जब तक चेतना जगी रहे
पिंजरे में रहता अंतर्मन
जैसे ही चेतना शांत हुई
पहुंचूं सपनों की मधुशाला || ११५ ||

इच्छाओं के खाली प्याले
लेकर उदास वो बैठी है
न स्वप्न मधु प्रेमी कोई
तनहा सपनों की मधुशाला || ११६ ||

मैं जैसे उस नगरी पहुंचू
वो देख मुझे हर्षाती है
आया उसका एक स्वप्न प्रेमी
गाये सपनों की मधुशाला || ११७ ||

उसकी कितनी आशाएं हैं
सारे ही स्वप्न पी जाऊंगा
मुझे सारे स्वप्न पिलाने को
आतुर सपनों की मधुशाला || ११८ ||

क्रूर कुटिल इस दुनिया में
न साथी संगी है कोई
बस एक मुझे अपना माने
मेरे सपनों की मधुशाला || ११९ ||

स्वाभिमान मधु प्याला भरकर
वो बोले इसका पान करो
अब बहुत हुआ दासत्व जीवन
जियो निज सपनों की मधुशाला || १२० ||

गढ़ो सपनों के कंचन प्याले
भरों उनमें निज कर्मों का मधुरस
जीवन भर उनका पान करो
जियो निज कर्मों की मधुशाला || १२१ ||

एक बार जो छलके प्याले से
वापस न प्याला पा पाए
अविरत बहता है समय मधु
निरंतर बहती समय मधुशाला || १२२ ||

घंटों मैं उसके पास रहूं
भ्रम में सही सब स्वप्न जियूं
उन्हें पूर्ण करने की शपथ लिए
छोडूं सपनों की मधुशाला || १२३ ||

वो जाते जाते मुझे कहे
एक स्वप्न तो कल तुम जी आना
एक प्याले का बोझ तो कम होगा
प्रार्थी सपनों की मधुशाला || १२४ ||

आँखों में अश्रु सुधा लिए
मैं कुछ भी न उसको कह पाऊं
फिर मौन मेरा उत्तर लेकर
विदा ले सपनों की मधुशाला || १२५ ||

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भाग ८

सबकी अपनी मदिरायें हैं
हैं सबके अपने मधुप्याले
सबको है अपने मय का मद
है सबकी अपनी मधुशाला || १२६ ||

अपने अपने मय प्याले पी
अपने जीवन में मस्त रहें
न फिक्र किसी की कोई करे
सबके पास है अपनी मधुशाला || १२७ ||

हे सज्जन तुम ही मुझे कहो
जो सबकी अपनी मधुशालाएं
तो सोमरस देने वाली
क्यूँ न हो मेरी मधुशाला || १२८ ||

उन ब्रह्मा का स्मरण करो
वेदों से मधुरस लेते हैं
वो वेद हैं उनके मधुप्याले
ब्रह्मज्ञान ही उनकी मधुशाला || १२९ ||

उन गोविन्द का स्मरण करो
जो योग का मधुरस पीते हैं
बंसी राधे हैं मधुप्याले
वो अनन्य प्रेम ही मधुशाला || १३० ||

मथुरा की पावन धरती पर
कृष्ण प्रेम का मधु रस बहता है
हर भक्त वहां का मधुप्याला
है भक्ति उसकी मधुशाला || १३१ ||

उन शिव का भी तुम ध्यान धरो
विष का उन्होंने मधुपान किया
तांडव नृत्य है उनका मधुप्याला
जग कल्याण ही जिनकी मधुशाला || १३२ ||

वो पवनपुत्र वो महावीर
सदा राम नाम का मधु पियें
राम भक्ति जिनका मधुप्याला
स्वयं राम ही जिनकी मधुशाला || १३३ ||

कोई प्रेम का मधुरस पीता है
प्रियतमा की आस में जीता है
विरह टूटे एक छवि मिले
ये अभिलाषा ही मधुशाला || १३४ ||

प्रेम पिपासु वो प्रेमी
विरह का मधुरस पीता है
निजमन है उसका मधुप्याला
है मिलन कामना मधुशाला || १३५ ||

प्रेमिका की एक वो अमिट छवि
आखों के प्यालों का मधुरस
एक बार पिए तो प्राण बचें
वो अनुपम दर्शन मधुशाला || १३६ ||

प्रियतमा से अपनी मधुर मिलन
वो प्रेमी हर पल यही मांगे
प्रियतमा की आँखें मधुप्याले
प्रियतमा की बाहें मधुशाला || १३७ ||

प्रियतमा की भी है यही आशा
उस प्रेमी का अनुराग मिले
वो प्रेम स्पर्श है मधुप्याला
उसका आलिंगन मधुशाला || १३८ ||

जब मधुर मिलन फिर हो जाये
जो प्रेम सुधा फिर मिल जाये
दोनों के मन हैं मधुप्याले
वो प्रेम समर्पण मधुशाला || १३९ ||

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भाग ९

कुछ गर्व के अपने प्यालों में
धन धान्य का मधुरस पीते हैं
वो व्यापारी वो धन कुबेर
धन कोष है जिनकी मधुशाला || १४० ||

कुछ लोभी हैं कुछ नकारे
कुछ न करने के ही मारे
कुछ किये बिना सब पाने की
लालसा ही जिनकी मधुशाला || १४१ ||

स्वाभिमान के छलके प्यालों में
आज़ादी के वो परवाने
स्वराज्य का मधुरस पीते थे
आज़ादी जिनकी मधुशाला || १४२ ||

वो रोष का मधुरस न पीते
वो क्रोध का मधुरस न पीते
न होता स्वतंत्र कोई प्याला
न स्वतंत्र ही कोई मधुशाला || १४३ ||

मृत्यु के भय पर विजय पा
सीमा रक्षा में लीन रहे
देशभक्ति जिसका मधुप्याला
राष्ट्ररक्षा सैनिक की मधुशाला || १४४ ||

पर ऐसे भी कुछ नेता हैं
बस स्वार्थ का मधुरस पीते हैं
दुष्कर्म अकर्म ही मधुप्याले
भ्रष्टता ही जिनकी मधुशाला || १४५ ||

उस भँवरे को ही तुम देखो
है पुष्प के आगे मंडराता
पुष्प पंखुरियाँ हैं मधुप्याले
वो पुष्प ही उसकी मधुशाला || १४६ ||

उस दीपक को भी तुम देखो
ज्योति का वो मधुपान करे
बाती घृत उसके मधुप्याले
आलोक ही उसकी मधुशाला || १४७ ||

उस पथिक की तुम कल्पना करो
अविरत ही अपनी राह चले
उसके दो पग हैं मधुप्याले
वो राह है उसकी मधुशाला || १४८ ||

सरगम के कुछ पागल प्रेमी
नगमे ही नगमे गाते हैं
हैं सुर ही जिनके मधुप्याले
संगीत ही जिनकी मधुशाला || १४९ ||

अपनी धुन में उड़ता पक्षी
अम्बर को चुनौती देता है
दो पंख हैं उसके मधुप्याले
चिर उड़ान ही उसकी मधुशाला || १५० ||

खुद गीला गमछा ओढ़, धरा को
फसल की चुनरी पहनाता
अन्न उगाकर उदर भरे
खेती किसान की मधुशाला || १५१ ||

एक माता का नवजात शिशु
जब दुग्ध मधु रस पीता है
वो दुग्ध श्रोत हैं मधुप्याले
माता कल्याणी मधुशाला || १५२ ||

थक हार के अपने कामों से
जब शाम को अपने घर लौटे
गृहणी बच्चे हैं मधुप्याले
गृहस्थी गृहस्थ की मधुशाला || १५३ ||

देखो तनिक इस चंदा को
चांदनी का मधुरस पीता है
पूर्णिमा अमावस दो प्याले
वसुधा आकर्षण मधुशाला || १५४ ||

इस सूरज की ही बात करो
अग्नि का मधुरस पीता है
तपन का है बस एक प्याला
तपना ही जिसकी मधुशाला || १५५ ||

इस धरती का ही मनन करो
मेघों से मधुरस लेती है
तो कौन बचा इस दुनिया में
न हो जिसकी कोई मधुशाला || १५६ ||

पीने का अर्थ जो पहचाने
जीवन का अर्थ सही जाने
क्या है मदिरा, क्या है प्याला
वो जाने क्या है मधुशाला || १५७ ||

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भाग १०

वे सज्जन बोले हे मानव
सुनकर तुम्हारी ये सब बातें
आज मैं जाकर पहचाना
क्या है मधु देवी मधुशाला || १५८ ||

शत नमन करूँ मैं उस मधु को
जिसका है तुमने पान किया
शत नमन करूँ मैं वो देवी
जिसको तुम कहते मधुशाला || १५९ ||

व्यर्थ मधु को सब कोसें
अपमानजनक कथन बोलें
कितना सम्मानित मधुरस है
कितनी आदरणीय मधुशाला || १६० ||

सुनकर तुम्हारे वचनों को
लगता है मुझको अब ऐसे
जग में एक सच्ची है मदिरा
दूजी सच्ची है मधुशाला || १६१ ||

अब ऐसे लगता है मुझको
मधुपान किये ही जाऊं मैं
अब प्याले कभी न खाली हों
जीवन मैं बिताऊं मधुशाला || १६२ ||

अनमोल तुम्हारे शब्दों ने
कैसा मुझपे जादू है किया
मन पाना चाहे मय का रस
मन जाना चाहे मधुशाला || १६३ ||

मुझको भी अपने साथ में लो
कुछ प्याले मैं भी पी लूंगा
तुमको जहाँ ये ज्ञान मिला
वो गुरु अपनाऊँ मधुशाला || १६४ ||

मैं बोला सज्जन न समझे
कितना वर्णन विस्तार किया
न तुम मधुरस को पहचाने
न तुम पहचाने मधुशाला || १६५ ||

मैंने अपना मधुपान किया
तुम पान करो अपने मय का
अपनी मदिरा मैं पहचाना
तुम पहचानो अपनी मधुशाला || १६६ ||

कितने ही मधुरस पान किये
कितने ही मदिरालय घूमा
पर परम मधु की प्यास बुझी
जब पाई अपनी मधुशाला || १६७ ||

वे सज्जन बोले हे मानव
तुम कैसी दुविधा देते हो
क्या अपने अपने हैं मधुरस
क्या अपनी अपनी मधुशाला || १६८ ||

मैं बोला सज्जन नहीं कठिन
इतनी सी बात समझ लेना
सबकी अपनी प्रतिभाएं हैं
वे प्रतिभाएं ही हैं मधुशाला || १६९ ||

जो प्राणी जन्म यहाँ लेता
है कुछ विशेष उसमें होता
वो विशेष कर्म हैं मधुप्याले
उसकी विशेषता मधुशाला || १७० ||

सर्वप्रथम स्वयं को पहचानो
फिर लक्ष्य को अपने तुम जानो
लक्ष्य प्राप्ति का प्रयास मधुरस
वो लक्ष्य तुम्हारी मधुशाला || १७१ ||

किसी और से कदम मिलाओगे
न अपनी मधु को पाओगे
न पाओ सुख अपने मन का
न पाओ अपनी मधुशाला || १७२ ||

मन का तर्पण है वस्तु नहीं
बाजार जो तुमको मिल जाये
स्वयं ही है तुमको वह पानी
निज मन की तृप्ति मधुशाला || १७३ ||

न अपना मधुरस पहचाने
दासत्व का विषरस पी माने
कंठष्ठ करो मेरी वाणी
न भाये पराई मधुशाला || १७४ ||

धन्य हैं सभी पीने वाले
जो अपना मधु रस पहचाने
स्व निर्माण किया अपना प्याला
स्व सृजित की अपनी मधुशाला || १७५ ||

निज सपनों को साकार करे जो
वही सच्चा मधु प्रेमी है
वही सच्चा पुरुषार्थ करे
जिसकी अपनी हो मधुशाला || १७६ ||

अब चलता हूँ मैं देर हुई
मेरा मधु रस मुझको याद करे
वो प्याले मेरी राह तकेँ
बाट जोहती मेरी मधुशाला || १७७ ||

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भाग ११

वे सज्जन बोले हे मनुज
एक अंतिम प्रश्न मैं करता हूँ
सच में है क्या तेरा मधुरस
सच में क्या तेरी मधुशाला || १७८ ||

अधरों पे एक मुस्कान लिए
मैंने उन सज्जन को बोला
चलो बता तुम्हें मैं देता हूँ
क्या मेरी अनुपम मधुशाला || १७९ ||

मैं बोला शब्द मधुप्याले हैं
जो भाव निकलता है मधुरस
मेरे लेख ही मुझको तृप्त करें
मेरा लेखन मेरी मधुशाला || १८० ||

जो एक बार पढ़ ले इसको
गीता वेदों का सार मिले
कोई और सार न चाहे मन
चाहे बस केवल मधुशाला || १८१ ||

शब्द नहीं ये भाव नहीं
भावना का अनुपम सागर है
या तुम डूबो या मैं डूबूं
दोनों पहुंचेंगे मधुशाला || १८२ ||

है लेख नहीं कुछ शब्दों का
नारायण इसमें समाये हैं
ये मधुशाला ही दुनिया है
ये दुनिया ही है मधुशाला || १८३ ||

आगमन है क्या प्रस्थान है क्या
है सृजन कहाँ है गमन कहाँ
सब आते हैं मधुशाला से
है जाना सबको मधुशाला || १८४ ||

इससे पहले अंतिम विराम
मैं दूँ अपनी मधुशाला को
इस जीवन का शत धन्यवाद
ये जीवन भी तो है मधुशाला || १८५ ||

श्वासों के अपने सब प्याले
भरकर के प्रेम की मदिरा से
नित्य तुम उसका पान करो
तो आनंदित जीवन मधुशाला || १८६ ||

जब जग आया जीवन आया
न कुछ आया जीवन आया
इस जीवन का सम्मान करो
ये सबसे अनुपम मधुशाला || १८७ ||

जो आएंगे वो पाएंगे
जो जाएंगे फिर आएंगे
और हर पल गाते जायेंगे
हे मधुशाला, हे मधुशाला || १८८ ||

वो सोयेंगे स्वर गूंजेगा
वो जागेंगे स्वर गूंजेगा
वो खो देंगे स्वर गूंजेगा
फिर पा लेंगे स्वर गूंजेगा
मन की हर कम्पित धड़कन से
बस एक स्वर गूंजे मधुशाला || १८९ ||

हैं धरा अम्बर जब तक जग में
और जब तक चंदा तारे हैं
गायी जाएगी हर मन में
तब तक मेरी ये मधुशाला || १९० ||

न रोक स्वयं को पाएंगे
जो एक बार पढ़ जायेंगे
वो मन ही मन दोहराएंगे
हे मधुशाला, हे मधुशाला || १९१ ||

कल्पना से शब्दों को चुनकर
मैंने प्रेम की मधु बना ली है
चाहे पान करो चाहे गान करो
मैंने है पा ली मधुशाला || १९२ ||

आत्मा के किसी एक अंतर को
झकझोर कहीं ये आयी हो
तो इसके स्वागत में बोलो
हे मधुशाला, हे मधुशाला || १९३ ||

हर प्राणी के निज जीवन का
है सार बताती मधुशाला
जो भाई हो मन से बोलो
हे मधुशाला, हे मधुशाला || १९४ ||

यदि सच्चे अर्थों में तुमको
जीवन मधु पान कराया हो
तो अधरों को अपने खोलो
कहो मधुशाला, बोलो मधुशाला || १९५ ||

-मंजूसुत ईशांश

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