“अनजाने से ख्वाब में मैंने देखा एक अनजान चेहरा”

अनजाने से ख्वाब मैं मैंने
देखा एक अनजान चेहरा
आँखों का रंग था काला उसका
बालों का रंग सुनेहरा
सारी रात मेरी निंदिया पे
था उसका हरदम पहरा
अनजाने से ख्वाब में मैंने
देखा एक अनजान चेहरा ||

उसके होठों का रंग था ऐसा
जैसे सुबह की लाली का रंग
मेरा उसका मिलन था ऐसा
जैसे कृष्ण राधा हों संग
उसके हर अंदाज़ ने था
क्या क्या आनंद बिखेरा
अनजाने से ख्वाब में मैंने
देखा एक अनजान चेहरा||

आँखों में थी सागर सी गहराई
बोलों में मिसरी की मिठास
सपन नगरी में सारी रात
वो बैठी मेरे पास
अनजानी सी उस खुशबु का
एहसास था कितना गहरा
अनजाने से ख्वाब में मैंने
देखा एक अनजान चेहरा||

जब जब लेती थी अंगड़ाई
एक मस्ती सी छाती थी
दूर पहाड़ों से मस्त घटायें
दौड़ी दौड़ी आती थीं
उसका चंचल रूप बना था
मेरे मन का लुटेरा
अनजाने से ख्वाब में मैंने
देखा एक अनजान चेहरा||

उसकी हंसी की धुन पे
गीत पंछी गुनगुनाते थे
रंग बिरंगे सब फूलों के
चेहरे खिलते जाते थे
देख के उसका सुन्दर मुखड़ा
मन पुलकित होता मेरा
अनजाने से ख्वाब में मैंने
देखा एक अनजान चेहरा||

इस जग की तो नहीं थी वो
फिर किस जग से आई होगी
ऐसा रंग रूप अनोखा
किस जग से लायी होगी
सपने में ही दुआ करता मैं
थोड़ा और टल जाये सवेरा
अनजाने से ख्वाब में मैंने
देखा एक अनजान चेहरा||

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