“हे मातृ वंदनीय, हे जननी वंदनीय”

हे मातृ वंदनीय
हे जननी वंदनीय |
तुझसे हमारी पहचान
भारत माँ तू वंदनीय ||

हिमालय मुकुट सजा है
हे माता शीश तेरे |
कोमल चरण है छूता
वो विशाल सिंधु तेरे ||
गंगा का दिव्य पानी
है तेरे केश धोता |
हर एक अलग ऋतु में
श्रृंगार नया होता ||
तेरा रूप दर्शनीय
सौंदर्य दर्शनीय |
हे मातृ वंदनीय
हे जननी वंदनीय ||

हर धर्म को समेटे
हर जाति को समेटे |
बिन भेद के बिन भाव के
जन-जन को तू समेटे ||
हर भाषा को समेटे
हर शैली को समेटे |
भारतीयता के सूत्र से
मन-मन को तू समेटे ||
तेरा आज शोभनीय
इतिहास शोभनीय |
हे मातृ वंदनीय
हे जननी वंदनीय ||

आज़ाद तुझे कराने
कितना लहू बहाया |
ज़ालिमों से बचाने
कितनों ने शीश कटाया ||
याद है भगत की फांसी
याद है झाँसी की रानी |
याद हैं गांधी के उपदेश
याद है नेहरू की वाणी ||
वतन के उन दीवानों को
सलाम हम हैं करते |
उन देशप्रेमियों को
प्रणाम हम हैं करते ||
उनकी गाथा कर्णप्रिय
उनका गान कर्णप्रिय |
हे मातृ वंदनीय
हे जननी वंदनीय ||

है हिन्द की कसम ये
तेरी लाज हम रखेंगे |
कभी जो वक़्त आया
बलिदान हम करेंगे ||
देते तुझे वचन ये
तेरी रक्षा हम करेंगे |
कोई कुदृष्टि डाले
हम सीना चीर देंगे ||
तेरी आन हमको प्रिय
तेरी शान हमको प्रिय |
हे मातृ वंदनीय
हे जननी वंदनीय ||

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